Tuesday, December 26, 2017

क्या देश का सविधान बदलने की कवायद में है सत्तारूढ़ भाजपा?

एक सम्मानित अख़बार में छपे केन्द्रीय मंत्री के बयान पर समाज के वर्गों से एक तीखी प्रतिक्रिया मिली है| वरिष्ठ दलित चिन्तक लालजी निर्मल ने खबर की तस्वीर सोशल मीडिया में साझा करते हुए संविधान में बदलाव के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी है| जिसमे संविधान के बदलाव पर विरोध मुखर हो उठा है| लालजी निर्मल ने केन्द्रीय मंत्री के इस बयान पर तीखी आपत्ति दर्ज कराते हुए कहते हैं कि अपनी जाति पर नाज करने वाले दलित और पिछड़े यह जान लें कि जाति को कायम रखना हेगड़े के लिए जरूरी क्यों है।लालजी निर्मल का मानना है कि जाति बहुजनो के लिए नाज करने का नहीं वरन त्याज्य करने और हतोत्साहित करने का विषय है। साथ ही उनका ये भी मानना है कि जो दलित पिछड़े लीडर्स अपनी जातियों की राजनीति कर रहे है वे बहुजन एकता और अम्बेडकरी मिशन के दुश्मन हैं । इतना ही नहीं जातिवादी राजनीति के पैरोकारों के लिए उन्होंने खुला आरोप लगाया है कि वे परोक्ष रूप से हेगड़े की विचारधारा को मजबूत कर रहे हैं। ब्राह्मणों को खुश करने के लिए बयान दिया है ! अथवा जतियाँ और उनके बीच की खाइयों को बरकरार रखकर सवर्णों के हित की बात ध्यान रखी गई है ! ये मानना है दलित  चिन्तक विनोद कुमार का| 
राजस्थान यूनिवर्सिटी से दलित चिन्तक रविन्द्र मेघवाल ने और ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया दी है, उनका मानना है कि गिरगिट अपना असली रंग दिखा गया l यह एक कुटिल चाल के तहत हो रहा है और हम है की आँखे बन्द करके इसे सिरे से नकार रहे है आखिर सविधान तो कोई माई का लाल बदल ही नही सकता l  अगर बदल दिया तो क्या कर लोगे? केन्द्रीय मंत्री के इस बयान पर तकनीकी विशेषज्ञ दिला सिंह का सवाल संविधान की बुनियादी फिक्रमंदी से जुड़ा है, वो सवाल करते हैं कि क्या यह बयान संविधान में दिए मौलिक कर्तव्यों के विरुद्ध नहीं है ,जिसमें प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है कि वह संविधान का सम्मान करे ? मोदी सरकार के मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने ब्राह्मण युवा परिषद के सम्मेलन में संविधान को बदलने की बात की. वहां एक भी देशभक्त ब्राह्मण ऐसा नहीं था, जो उठकर बोलता कि मंत्री जी आप गलत बात कर रहे हैं.यह कहते हुए जवितेश सिंह ने भाजपाई ब्राह्मण समुदाय पर करार तंज कसा है | 
हालाँकि एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि देश का संविधान राष्ट्रीय प्रगति की गतिशीलता का आधार है| सामाजिक कार्यकर्त्ता राकेश मिश्र विद्यार्थी ने दलित विद्वानों के संशय पर व्यंग्य किया है कि संविधान न हो गया मंदिर का भगवान हो गया... आप लोग भी संवैधानिक छुआछूत फैलाये जा रहे हैं, देश, काल, परिस्थितियों के मुताबिक संविधान बदलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है... जो बहुमत लेकर राज करेगा वो कानून बनाएगा तो संविधान बदलेगा ही, कुछ नया जुड़ेगा, कुछ बेहतरी भी होगी| लगता है कि आप लोग संविधान को जड़ और व्यवस्था को मंदिर के पत्थरों की तरह मुर्दा साबित करने में लगे हैं? क्यों भाई... ऐसी ज्यादती की क्या वजह है? 
लेकिन संविधान सबका विधान है और उसमे हेर-फेर पर फिक्रमंदी  दलित दलित ही नहीं हर वर्ग की सोच में होना लाजिमी है| ब्रज बाला के मुताबिक संविधान बदलिए जरूर मगर सबको बराबर के हक के साथ। उनके मौजूं सवालों में यह कहना लाजिमी है कि कोई क्यों एक ही धर्म में जातियों के दरारों में दबे? किसने मना किया है करिये ना जातियों को रफा दफा करने की बातें संविधान में अपनी गोष्ठियों में सेमिनारों में। जातियों की ऊंच नीच वैसे भी देश के इतिहास पर गुलामी का काफी बोझ डाल चुकी है। चाहे वह बाहर वालों की थी या अंदर वालों की। अगर आप जातियां कायम रखते हुए धर्म के आधार पर संशोधन की बात करते हैं तो यहा नीयत की परोक्षता पर किसी अनपढ को भी शक हो सकता है। धर्म-निरपेक्षवाद के साथ साथ जाति निरपेक्षता की बात क्यों नहीं? लेकिन संविधान की अपनी विडंबनायें हैं, कुछ नजीरें देखिये, पहली दिक्कत देश तो की विधायी निरक्षरता है,  इससे निपटने के लिए अभी तक कोई औपचारिक व्यवस्था साकार हुई भी तो उसको आखिरी आदमी तक पहुँचाने में कितने सौ साल लगेंगे ये सवाल दूर की कौड़ी है| ये विधायी निरक्षरता इस कदर है कि कोई कहे कि कौव्वा कान लेकर उड़ गया और आप कौव्वे के पीछे दौड़ लगा दें, ऐसा नहीं चलेगा| शुक्र मानिए कि संविधान आज़ादी के इकतालीस सालों तक अंग्रेजी में रहा तब भी लोगों ने उसे स्वीकार किया, मै होता तो कह देता कि किसी गोरे के कब्र में गाड़ दीजिये ऐसे संविधान को, गौरतलब है कि संविधान का औपचारिक हिंदी अनुवाद 1988 में हुआ| आज भी सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेजी में जिरह होती है, अक्सर उस जिरह का मतलब न तो वादी को पता होता है और न ही प्रतिवादी को, जरा बताएं तो ऐसे संविधान का क्या तुक जिसमे अपनी भाषा में न्यायिक प्रक्रिया तक सहज सुलभ न हो, लेकिन हम झेलते हैं| संविधान के नाम पर कानून तो लोकसभा,  विधान सभा और स्थानीय निकायों तक की बैठकों में लगभग रोज बनते हैं जबकि  अनपढ़ अवाम के साथ इससे बड़ा छल क्या होगा कि 99.99%  इस देश की 99.99% आबादी को कानून का ककहरा तक पता  नहीं| इसके बावजूद हम मानते हैं कि यह देश संविधान से चलता है| जानते हैं दलित और संविधान का क्या रिश्ता है, दलितों के साथ एक खूबसूरत मजाक हुआ, मलिन बस्तियों और दलितों के गाँवों के पास एक मूर्ति बनी जिसमे अक्सर नीला कोट पहने हाथ में एक किताबनुमा कोई चीज लिए एक आदमी किसी दिशा में ऊँगली दिखाता है| उस मूर्ति को अम्बेडकर कहा गया और उस किताबनुमा चीज को संविधान| संविधान और अम्बेडकर का बस इतना मतलब है, न किसी को किसी ने कानून बताने सिखाने की कोई कोशिश करता है और न ही देश के संघीय ढाँचे की कोई जागरूकता बन पायी| कितने चिंतकों, फिक्रमंदों, नौकरशाहों, नेताओं दलितों के मसीहाओं ने विधायी साक्षरता को लेकर पहल की? कितने राजनेता  अपने क्षेत्रों में कानून बताने जनता को लेकर बैठे? चलिए यही बता दीजिये कि कितने दलित राजनेताओं ने समुदाय विशेष की विधायी जागरूकता की कोई पहल की|  फिर भी ये देश के लोगों की बुनियादी समझदारी है कि देश में सभी भले ही अदालतों के चक्कर लगा के, वकीलों से लुट पिट कर उन्होंने व्यवस्था का अनुभव किया हो, सभी मानते हैं कि यह देश संविधान से चलता है| राकेश मिश्र विद्यार्थी  ऐसे सभी लोगों से हाथ जोड़कर एक निवेदन करते हैं कि  महाराज असल की फसल उगाइये, आरक्षण संविधान और अम्बेडकर भी जुमले बन जायेंगे तो बड़ी आफत खड़ी हो जाएगी| कुछ न कर सकें तो अपने अपने लोगों को संविधान के लिए जागरुक करिए| नगर-नगर और गाँव-गाँव में ये काम संविधान कथा बांचने का काम एक अकेला सूरमा कर रहा है,  गिरीश नारायण पाण्डेय| वो भी इसलिए क्योंकि बेजा आरोप -प्रत्यारोप में समय की बर्बादी से इस देश को बचाया जाए| लोगों में अपने कानून और संविधान की समझ बनेगी तो आम लोग भी अपने हितों के लिए अपने हको हुकूक के लिए लड़ तो सकेंगे|  
राकेश मिश्र विद्यार्थी कहते हैं कि दलित चिन्तक जातियां मिटाने में जान दिए देते हैं, वे बताएं तो कि धर्म निरपेक्ष का ये अर्थ कहाँ लिखा है कि व्यक्तिगत और सामुदायिक पहचान के सारे पैमाने मिटा दिए जाएँ| जब संविधान सभी तरह के समूहों को अपनी संस्कृति के लिए आज़ादी देता है तो आपको अपनी संकृति और सामाजिक सुरक्षा के लिए आज़ादी से कौन रोक रहा है? जातीय विषमताएं इसी संविधान के बुनियादी अवधारणाओं में समाहित हैं| जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषाई और लिंगभेद के आधार पर कानून तो कोई फर्क नहीं मानता| हाँ अगर दलित चिन्तक लोग  दिल में कोई निजी लोड लिए बैठे हों तो उसका इलाज मुश्किल है| जातियां ही नहीं भाषाएँ भी कायम रहें, लिंग, संप्रदाय और सामुदायिक व्यवस्थाएं भी कायम रहें, लेकिन किसी के साथ भेदभाव न हो, ये संविधान महज इतने मकसद के लिए बना है| यही संविधान का बुनियादी आधार है कि सामुदायिक और सामाजिक व्यवस्था में किसी के साथ फर्क न हो, लेकिन ऐसा नहीं होता है तो आप अपनी आपत्तियां दर्ज करवा सकते हैं, लेकिन उसका पैमाना भी देना होगा| वह पैमाना जो बहुजन हिताय बहुजन सुखाय से ऊपर उठकर सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय को प्रतिध्वनित करता हो|
हालाँकि तमाम स्वीकारोक्तियां दलित चिन्तक ब्रज बाला के इस बयान में भी दर्ज है जिसके मुताबिक जब दलित लोग मिथक गहनों से लदी फदी मूर्तियो के प्रेम में दीवाने हो झूम सकते हैं, गा बजा सकते हैं, और हां समय समय पर लज्जित भी हो सकते हैं, तो किताब थामें नीला कोट पहने मूर्ति तो फिर भी शिक्षापरक वास्तविकता के नजदीक है। उंगली की दिशा भी उन्नत दिशा में है । न कि और मूर्तियों के हाथ का पंजा सीधा रख सामने की ओर कि जैसा है वैसा ही स्वीकार कर लो आशीर्वाद समझकर। 
लोगों ने एक कपङे के गाँधी और दस लाख के कोट में प्रधानमंत्री को भी हाथों हाथ लिया है। एक वर्ग ने तो गाँधी के हत्यारों को भी पूजा है। 
यही भारत की विशेषता है कि उसने समय के साथ सबको स्वीकारा है।यही सबसे अलग करता है।
जरूरत आमजनता को संविधान हिंदी में समझाने की नहीं वरन् अपनी राष्ट्भाषा के प्रति जागरूकता की है। जिस दिन सारे अंग्रेज़ी स्कूल बंद हो जायेंगे आप अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढाना बंद कर देंगे तो यकीन मानिए उसी दिन वकीलों की जरूरत बंद हो जायेगी, आपके आने वाली पीढिया भारत की विविधता को ठीक से समझ पायेंगे।  और जरा प्रकाश डालेंगे कि ये व्यक्तिगत और सामुदायिक पहचान के पैमाने किसने बनाये हैं? पैमाने बनाने वालों की नजर में मानव मानव में भेद कैसे हुए? 
छोटे बङे होने की अवधारणा कैसे पनपी? क्यों इन पैमानों को बनाये रखने पर आपकी पुरजोर कोशिश है? क्या  फिर से किसी गुलामी की दस्तक महसूस किया जाये? या फिर मुस्लिमों और अंग्रेजों के शासन से उबरने के बाद फिर से उनके आने से पहले वाले समय मे जाने की चाहत है? लेकिन क्या मिलेगा पीछे जाकर जबकि वही व्यवस्था की अव्यवस्था ने देश की कमर तोङ दी थी भले ही आप दूध की नदियां बहने के मुगालते में रहें। दूध की नदियां सचमुच बहीं होंगी लेकिन उन लोगों के घर में जो मुख्यतः मेहनतकश थे और दुधारू  जानवरों को जैसे कि गाय और भैंसे पालकर समाज में दूध की पूर्ति कर रहे थे। लेकिन यहां ध्यान रखा जाये कि गाय और भैंस में भी भेदभाव कर दिया गया है। इसलिए आज संविधान में हर धर्म हर जाति हर परिवेश पर अनुच्छेदों की जरूरत पङी। वैसे भी जैसे शंकराचार्य की पदवी रिजर्व है वैसे ही संविधान संसोधन की बात करना दलितों पिछङों की सन्मति के वगैर हो न पायेगा। ये अलग बात है कि उन्हें साम दाम दंड भेद कौन सी नीति के तहत हैंडिल किया जायेगा। ये लोग इतना तो समझने ही लगे हैं। ऐसा नहीं है कि अवसरवादी दलितों में नहीं हैं लेकिन इतने कम हैं कि दिख जाते है अलग से दलित समाज में और दलित समाज उनकी भी भर्तस्ना करने से नहीं चूकता। 

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