Monday, December 4, 2017

...ताकि देश की जमीनें भाषा और बयान से न बंटें!


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आज देश में हिंदी, हिन्दू, हिंदुस्तान की जद्दोजहद अपना राजनीतिक आयाम मजबूत कर चुकी है, लेकिन ये भी सच है कि भाषा की प्रतीक हिंदी अपना गौरव खो चुकी है| हिंदी भाषी क्षेत्रों में भले ही हिंदी दिवस न होकर भाषा के नाम पर हिंदी पखवाड़े का चलन सामने आया है| लेकिन हिंदी भाषी अवाम के लिए यह भी एक मजाक जैसा है, वजह साफ़ है, उपरी अदालतें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को यह विडम्बना नजर नहीं आती, वहां अंग्रेजी ही चलती है| नौकरशाही को इसकी कोई परवाह नहीं, उनके लिए प्रशासनिक लिखा पढ़ी अंग्रेजी में होती है तभी उर्जा का संचार होता है| एक उदहारण चुनाव आयोग का ही है,  उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग ने ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाया| सभी जिला मुख्यालयों के अधिकारियों का प्रशिक्षण हुआ| उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों के शीर्षस्थ अधिकारियों के लिए कार्यक्रम में उपस्थिति अनिवार्य रही| तमाम अधिकारी और कर्मचारी गण चुनाव आयोग के अल्पकालिक प्रतिनिधि होते हैं| उनके नेतृत्व और व्यावहारिक प्रशिक्षण का ये कार्यक्रम चुनाव आयोग का ये एक उम्दा प्रयोग कहा जा सकता है| लेकिन अधिकांश अधिकारियों के लिए अंग्रेजी में प्रशिक्षण नितांत अव्यवहारिक साबित हुआ| अंग्रेजी में दिए गए प्रशिक्षण दस्तावेजों में लोगों ने अरुचि ही नहीं दिखाई, बल्कि लिख के भी दिया कि बेहतर होगा कि ये दस्तावेज हिंदी में उपलब्ध करा दिये जाएँ| हालाँकि चुनाव आयोग आगे क्या करता है वह तो समय के साथ सामने आएगा लेकिन भाषा के मामले में अंग्रेजी के सामने बहुसंख्यक आबादी दोयम साबित हो रही है|  
आज़ादी के बाद भारतीय भाषा आन्दोलन की बड़ी नजीर भी बहुत पुरानी बात नहीं, तब हिंदी को राजभाषा बनाने की कवायद चली तो तमाम दूसरी भाषाओँ वाले राज्य इसके विरोध में मुखर हुए, सार्थक समाधान की दिशा में जाने के पहले भारतीय भाषाओँ की दुर्गति पर भी गौर करना जरुरी हो जाता है| भाषाई अलगाववाद इस देश के भावनात्मक अलगाव की जड़ जैसा साबित हुआ है, वजह साफ़ है, भाषा ही भावनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम है| हिंदुस्तान का बंटवारा जिन वजहों से हुआ उनमे से एक अहम् वजह भाषाई विविधता भी रही है| जाहिर है कि अगर बंटवारा भाषाई आधार पर हुआ है तो भाषाई शुचिता के पैरोकारों को थोडा गहराई में उतरने की जरुरत है ताकि आगे देश की जमीनें भाषा की वजह से न बंटें|  यहाँ हर जाति की अपनी भाषा, संस्कृति और साहित्य रहा है, आज उनका घालमेल जगजाहिर है|
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं कि कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी, देश तमाम भाषाओँ का एक खुबसूरत गुलदस्ता रहा है और विविधता में एकता की मिसाल भी, आज भाषाओँ की दीगर बदहाली की एक बड़ी वजह हमारा राजनीतिक व्यभिचार भी है| 
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे ने एक भाषण दिया, भाषण नफरत से भरा पुलिंदा था जिसमे यूपी बिहार वालों के खिलाफ जहर उगलते हुए उन्होंने ऐलान किया कि यूपी के भैया और बिहारियों के हाथ काट दिए जाएँ| उसके बाद ही रोंगटे खड़े करने वाली एक घटना में दो लोगों के हाथ काट दिए गए| | ये ऐसा वाकया था जो किसी के लिए भी चिंता का सबब होना चाहिए| उस समय विहिप के प्रवीण तोगड़िया, एएमआईएम के असादुद्दीन ओवैसी और राज ठाकरे जहर उगलने के लिए मशहूर थे, शायद आज भी हैं| ये यूपी बिहार के प्रवासियों भर की दिक्कत नहीं थी, सारे देश में इसके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए थी, लोगों की बेचैनी देखते हुए Pravasi Bhalai Sangathan ने उनकी आवाज उठाई| संगठन के अध्यक्ष अविनाश कुमार सिंह ने उनके लिए लड़ने की हिम्मत की, लोगों को संगठित किया, नफरत के सौदागरों से निजात पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की| वकील की फीस भरने के लिए अपनी संपत्ति तक बेचीं| पूरी हिम्मत से लड़े, अदालत में कार्यवाही तीन साल चली, तमाम राज्यों और निर्वाचन आयोग ने अपनी अपनी दिक्कतें बताते हुए इस मामले में कानून बनाने को जरुरी माना| अदालत में फैसला हमारे हक में हुआ| अदालत से मामला पहुंचा विधि आयोग को| अब उनको कानून बनाना है| इस प्रक्रिया में तीन साल गुजर गए| आगे क्या होगा वो आप सबके हाथ में है, आप चाहें तो हम उन सभी दस्तावेजों को आपको दिए देते हैं, जो कर सकिये करिए|

अब बात करते हैं भाषा की शुचिता और अभिव्यक्ति की आज़ादी की| भाषा की शुचिता विशुद्ध अकादमिक मामला है, शिक्षा यानि स्वर-वर्ण विज्ञानं, व्याकरण, छंद, कल्प, निरुक्त के अपने-अपने आयाम हैं, इन्हें वेदांग कहा जाता है, रस अलंकार और रूपक के अपने मायने हैं जिसमे भावनाओं की अभिव्यक्ति मजेदार और वजनदार होती है, लोगों में धाक जमती है, इसी से समाज चलता है और भावना के प्रवाह का बुनियादी ढांचा बनता है,| लेकिन आजकल हमारा एकेडेमिया लापरवाही का शिकार है, सरकारी और असरकारी का फर्क दीगर है, भाषा की शुचिता और अभिव्यक्ति की आज़ादी की लापरवाही से आजकल एक नया बच्चा पैदा हुआ, उसका नाम है जुमलेबाजी| जुमलेबाजी यूँ तो कोई नई बात नहीं, साहित्यकार की कलम और कवि की कल्पना से लेकर इस देश की राजनीति तक उसकी मौजूदगी बजाहिर है| मालूम होता है कि आज नेता को कहे का कवि साहित्यकार को अपने लिखे का और नौकरशाही-अधिकारी को अपने किये का होश ही नहीं| वकील, पत्रकार, डॉक्टर, मास्टर और अंग्रेजी औद्योगिक क्रांति और पुनर्जागरण की बनायीं नयी अवाम इस बदहाली की शिकार है| वही शहरी अवाम बीमारी की जड़ भी है और दवा भी| कवि, लेखक, साहित्यकार व्यवस्था में हाशिये के बाहर होते जा रहे हैं| 
विश्वविख्यात विद्वान राजीव मल्होत्रा लिखते हैं कि "तिरुमुरुगा किरुपानंदा वारियार (1906-93) शैव और कालजयी तमिल साहित्य और आध्यात्मिकता, दोनों के एक बड़े विद्वान थे। जब उनसे पूछा गया कि क्या शैवों को संस्कृत मंत्रों का उपयोग करना चाहिए, उनका उत्तर था:

चूंकि संस्कृत (भारत में) सभी लोगों की सामान्य भाषा है, सभी मंत्र संस्कृत में हैं ... अनन्त काल से शैवों ने परम्परा से संहिता के मंत्रों का उच्चारण किया है। इसका विश्लेषण घृणा से करना लाभदायक नहीं है। 
इस पृष्ठभूमि के बावजूद, आज तमिल आधारित गैर-वैदिक पद्धतियों का अभियान तेज हो रहा है और द्रविड़वादियों के एक वर्ग द्वारा उसका नेतृत्व किया जा रहा है। ऐसा ही एक लोकप्रिय अभियान सत्यावेल मुरुगन द्वारा चलाया जा रहा है, एक बिजली अभियंता जो बाद में स्वयंभू शैव सिद्धान्त धर्मशास्त्री और तमिल कर्मकाण्ड के विद्वान बन गये। वह ‘तमिल विवाहों’ की परिकल्पना को लोकप्रिय बना रहे हैं जिसमें वैदिक पद्धति को अस्वीकार करते हुए उनके स्थान पर तमिल स्तोत्रों को लाया जा रहा है। वह कहते हैं:
… संस्कृत शब्द ‘विवाह’ का अर्थ होता है अपहरण करना, अर्थात् विवाह के उद्देश्य से किसी कन्या का अपहरण करना, जो कार्य, यह कहने की आवश्यकता नहीं, बर्बर है ... इससे भी बड़ी बात यह कि संस्कृत-विवाह में जिन मंत्रों का उच्चारण किया जाता है वे न तो हमारी समझ में आने लायक हैं और न ही उनके लिए जो इनका उच्चारण करने हैं, क्योंकि संस्कृत एक मृत भाषा है। संस्कृत-विवाह में अनेक अनुष्ठान हैं जो उबाऊ, अतार्किक, अनैतिक, अश्लील और आपत्तिजनक हैं 


वरिष्ठ छात्रनेता अमित मिश्रा के मुताबिक कानपुर में तमाम भाषाई विविधता और सांस्कृतिक समन्वय को धता बता कर किये गए परिसीमन को एक नजीर मानें तो चुनाव आयोग हमारी व्यवस्था में एक नया तानाशाह बन के सामने आया है, जो हमारे बीच होते हुए अदृश्य है, कोई जिम्मेदारी लेने की हालत में नहीं| 
ऐसे में पद्मश्री गिरिराज किशोर का ये कहना कि "चुनाव आयोग को भाषा संयम के बारे में भी कुछ नियम निर्धारित करने चाहिए। पहली बार चुनाव में असंयमित विशेषणों का प्रयोग देखने में आ रहा है। एक तो जतिगत सर्वनाम या विशेषणों का प्रयोग नहीं होना चाहिए। जैसे किसी के पिता की जाति या धर्म बदल देना, माँ या के पिता के धर्म अलग होने पर किसी पर आक्षेप करना। किसी को पिता के आर्थिक स्तर का उल्लेख करना। जो व्यक्ति नहीं है वह व्यंग्य के रूप में आरोपित करना। जैसे बादशाह के बेटे को सत्ता चाहिए आदि। इस तरह के संबोधन स्थायी वैमनस्य पैदा करते हैं। राजनैतिक वैमनस्य खतरनाक साबित हो सकते हैं। पार्टी के स्तर पर भी और व्यक्तिगत स्तर पर भी। स्वच्छ,मालिन्य विहिनचुनाव हों यह चुनाव आयोग का पहला दायित्व है" एक नितांत अगंभीर बयान है।
चुनाव आयोग और विधि आयोग तमाम विद्वानों की कवायदों से चलता है, उसमे अवाम के चिन्तक, दार्शनिक, कवि, साहित्यकारों का दखल न्यूनतम है| लेकिन विगत दो दशकों से हमारे लोकतंत्र में चुनाव आयोग का बोलबाला बढ़ा है| तमाम उदहारण मौजूद हैं कि नौकरशाही के प्रति अंधभक्ति देश के लोकतंत्र के लिए कितनी घातक है| उसके बावजूद हमारे विद्वानों को चुनाव आयोग में उम्मीद नजर आती है| जबकि भाषा के रहस्यों को उजागर करने का काम अवाम लोगों ने किया है| आज भषाओं की दुर्गति का क्या हाल है उसे दरकिनार करके चुनाव आयोग का पिछलग्गू हो जाना न तो अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए उचित होगा और न ही भाषाई विविधता वाले भारतवर्ष के लिए|  ऐसे में भाषा की राजनीति करने वालों को गहराई में उतरकर जिम्मेदारी लेनी होगी ...ताकि देश की अवाम और जमीनें भाषा की पहचान से न बंटें|

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