सिगरेट सरकारी राजस्व का एक प्रमुख स्रोत है, लेकिन सेहत के लिए हानिकारक भी| इसलिए सरकारी तौर पर आदेश हुआ कि सभी सिगरेट के पैकेटों पर ऐसे चित्र बनें कि लोगों को धुम्रपान करने से होने वाले नुकसान का भय हो और लोग भुम्रपान छोड़ें| आदेश मुकम्मल हुआ और ये बात वाजिब भी लगती है, लेकिन बात उतनी सीधी नहीं जितनी अगर धुम्रपान से कैंसर होता है तो बेहतर तो यही रहेगा कि सरकार उस पर पाबन्दी लगाये, बीड़ी सिगरेट बिकवा के लोगों की समझदारी की परीक्षा लेने का क्या अर्थ है?
अगर कोई ये कहता है कि पाबन्दी से लोगो की निजता मे दखल होगा फिर उसके लिए आंदोलन होगा ये एक कोरी ग़लतफ़हमी है| लती लोग अपनी सेहत भर के लिए तो हिम्मत जुटा नहीं पाते व्यवस्था के लिए क्या खाक लड़ेंगे? जहाँ तक सोशल मीडिया का सवाल है ऐसे कोरी लफ्फाजी लखनऊ के एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय ने शराब के लिए शुरू की जिन्हें बोतालाचार्य भी कहा गया|
लेकिन आज मद्यपान नहीं धुम्रपान की बात करते हैं, धुम्रपान में तम्बाकू उत्पादक, पान बीडी की दुकान, विक्रता चैनल से लेकर उपभोक्ता तक के हित अनहित का अंतिम सत्य बीमारी है, बीमारी हो या न हो लेकिन शारीरिक अक्षमता तो होनी तय है, यह भी बताया जाता है कि अति धूम्रपान से नपुंसकता की बीमारी के भी खतरे हैं, श्वांस रोग के लक्षण और उनके परिणाम तो सिगरेट के पैकेटों पर बने चित्रों और प्रचार माध्यमों में दिखाए जाते रहे हैं| सिगरेट के पहले हुक्का हमारे धुम्रपान का राष्ट्रीय प्रतीक था, वह हुक्का आजकल प्रीमियम क्लास उपभोक्ताओं का फैशन है जिसमे तमाम किस्म के नशे और स्वाद का हालिया चलन एक नयी ईजाद है| सूखे में कौन कौन से नशे मिलते हैं इस पर कोई औपचारिक आंकड़ा मौजूद नहीं, लेकिन नए लड़के लड़कियों के लिए यह एक बड़ा आकर्षण बन रहा है| हुक्का बारों की वैधानिकता के लिए सरकारी तौर तरीके से ज्यादा असरकारी बारों का मादक माहौल होता है जहाँ मंद मंद संगीत से लेकर मादकता के नए आयाम चखने को मिल रहे हैं| वैधानिकता में सरकार कितनी फिसड्डी है ये आकलन करने वालों के लिए नए दौर के लोगों की निजता के मायने भी जान लेना जरुरी है| निजता की गलतफहमियों का ये दौर नशे के कारोबारियों के लिए अवसरों के दरवाजे खोलता है| कारोबारी तौर पर सरकारी इजाजत और रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता हो या न हो लेकिन निजता के मानकों का टोटा इस कदर है कि कई बार शराब पीकर बहकना और रेहड़ी वालों पर रौब दिखाना अमीरी की एक निशानी बन रहा है| लेकिन शहर के नामी और सफेदपोश माफिया नशे के कारोबार की बदौलत इज्जत और रसूख खरीदने की कवायद में लगे हैं, एक तरफ शराब का कारोबार करके आबादी बिगाड़ने का काम है तो दूसरी तरफ गौशाला, स्कूल, अस्पताल और धर्मार्थ व्यवस्थाएं| लेकिन सच्चाई तो यही है कि व्यवस्था की इस कॉकटेल में किन्ही साहेबान के दायें हाथ से दक्षिणपंथ और बाएं हाथ से वामपंथ चलता है|
फ़िलहाल लोगों की निजता जरुरी है कि सेहत ये काम तो सरकार को तय करना है, पहले नशा इतना आम नहीं था, गांजा-भांग-अफीम आदि मंदिरों के जिम्मे था जिनका आयुर्वेद में बहुत प्रयोग होता था, तम्बाकू और हुक्के का चलन कितना पुराना है कभी जाकर पता करिए तो उसकी तस्वीर भी मिल जाएगी| ताड़ी-शराब-कंट्री बड़ी स्थानीय चीज थी, जिसे प्रयोग करने वाले अपने हिस्से की आजादी से इस्तेमाल करते थे, इन सब में कॉर्पोरेट लालच की अंधी दौड़ नहीं थी| जब से अफीम आई तब से सिंडिकेट शुरू हुए, उसी अफीम के पैसे से शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन का पहला प्रयोग हुआ, चीन में अफीम के डेन बनाये जाने लगे हुक्का बार की तरह शुरुआत में मजा आता था, फ्री पिलाने का दौर भी चलता था, बाद में लोग लती हो गए तो राजा को युद्ध लड़ना पड़ा| इसी अफीम के कारोबार में हिंदुस्तान के साथ चीन के दो युद्ध हुए| इसी कारोबार में अंग्रेज परस्त चीनी माफिया भी पैदा हुआ और हिन्दुस्तानी माफिया भी| आपके शहर में अफीम कोठी है, जाकर पता कर लीजिये वहीँ पर चीन के लिए अफीम सप्लाई का स्टॉक एक्सचेंज था| कुल मिलकर हिंदुस्तान की अफीम से चीन का शिकार हुआ| लेकिन शराब के मामले में ये प्रयोग हिंदुस्तान में ही हुआ, पहले विदेशी शराब यहाँ के रईसों की शान बनी, शुरुआत में आम आदमी के लिए सपने जैसी थी| उन रईसों ने शराब की कमाई से शिक्षा जगत का उद्धार करने की सोची, शराब के रुपये से शिक्षा जगत की नयी व्यवस्था का खाका तैयार हुआ तो उसमे से नए बुद्धिमान निकले, उन्होंने शराब पीने को निजता से दिया| फ़िलहाल की व्यवस्था में शिक्षा व्यवस्था लाभदायक साबित नहीं, लेकिन जरुरी मानी जाती है| इसलिए उसकी बदहाली के बावजूद उसको ढोते जाना सरकारी दायित्व है| अब सरकारें तो कर्जे में चल रही हैं और शैक्षिक संस्थानों की जो हालत है उसमे कोई कर्ज देगा भी तो क्यों? ये तो पता करिए कि देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रदेश की प्रोविंशियल एजुकेशन सर्विसेज के आला अधिकारियों से लेकर शिक्षकों के वेतन का देनदार कौन सूरमा है? खैर ये पता चले तो नशे की सिंडिकेट के पाप धुलने जैसी बात नहीं| शराब कोई नई ईजाद नहीं लेकिन शराब पोषित शिक्षा व्यवस्था जरुर है| जिसमे शराब की हालत भारतीय आयुर्वेद की एक सौतेली बदचलन लड़की जैसी है जिसे पहली दुनिया के आशिकों ने हिंदुस्तान के बाज़ार में उतार दिया, अब सर चढ़ के बोल रही है, हमारे अपने बच्चे पढ़ाने का जिम्मा उठा रही है| शराब तो पहले से ही हमारी व्यवस्था का हिस्सा थी, तब भी पीने पर पाबन्दी तो नहीं थी, पारिवारिक अनुष्ठानों में सामूहिक तौर पर पीने की व्यवस्था तक मौजूद है| शास्त्रीय सन्दर्भों में देख लीजिये| कौलिक तंत्र में घोषित रूप से निजता और साधना दोनों के लिए मांस, मद्य, मैथुन, मत्स्य और मुद्रा ये घोषित पञ्च मकार हैं, ये तो गृहस्थ की वामाचार साधना के अभिन्न अंग रहे हैं| सिंडिकेट के बाद नया क्या हुआ कि शराब की कमाई से कार्पोरेटी लालच और हमारी नयी शिक्षा प्रणाली का जन्म हो गया| एक समय के बाद इस नकली शिक्षा व्यवस्था से डिमांड और निजता के नए नियम निकले| इस डिमांड और निजता की आड़ में शराब माफिया और चीनी चीनी मिलों का सिंडिकेट खड़ा हुआ| ये एकदम ताजी घटनाएँ हैं, बमुश्किल सत्तर से सौ साल का इतिहास है| वैध और अवैध मिलकर सिस्टम और निजता के आपसी सम्बन्ध तो यही हैं, आप भी अपनी निजता के मानक बताएं तो बात की जाए|
निजता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए किसी कविवर की अद्वितीय लेखनी का एक कमाल ये भी है|
'गंग भंग दुई बहन हैं, रहत सदा शिव संग। पाप निवारण गंग है, होश निवारण भंग।''
‘गंग भंग दुई बहन हैं, रहत सदा शिव संग। पाप निवारण गंग है, होश निवारण भंग।’’
निजता का सीधा अर्थ पूरे होशो हवास में तय होता है बदहवासी में नहीं, निजता के लिए एक मानक ईमानदारी भी है, जिसमे अपने शरीर, अपने लोगों, घर-परिवार रिश्तेदारों के लिए इमानदारी एक बुनियादी जरुरत है| यही जरुरत देश के लिए भी है लेकिन अखबारी किस्से कहानियों और शिक्षा जगत की देन है कि जुमले और स्पष्टीकरण की नयी परंपरा ईजाद हो गयी| ये जुमलेबाजी कौन सी पहचान बनाएगी ये सवाल समय पर छोड़ते हैं, लेकिन द्रवीभूत मादकता की तो गंध भी अलग पहचान लिए होती है| अब जुमलेबाजी धुम्रपान यानि सूखे या काले का असर है या विजया श्री का ये तो तहकीकात का विषय है|
आपकी निजता में देश के लिए क्या जरुरी है, सेहत, शिक्षा, निजता या नशा ?
फ़िलहाल तहकीकात तो अपने वश में नहीं लेकिन हिन्दू परंपरा की एक विलक्षण उपलब्धि आपके हवाले करता हूँ,
कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय
या खाए बौराए जग वा पाए बौराए|
तरक्की और निजता की एक नजीर ये भी देखते चलिए ....
अगर कोई ये कहता है कि पाबन्दी से लोगो की निजता मे दखल होगा फिर उसके लिए आंदोलन होगा ये एक कोरी ग़लतफ़हमी है| लती लोग अपनी सेहत भर के लिए तो हिम्मत जुटा नहीं पाते व्यवस्था के लिए क्या खाक लड़ेंगे? जहाँ तक सोशल मीडिया का सवाल है ऐसे कोरी लफ्फाजी लखनऊ के एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय ने शराब के लिए शुरू की जिन्हें बोतालाचार्य भी कहा गया|
लेकिन आज मद्यपान नहीं धुम्रपान की बात करते हैं, धुम्रपान में तम्बाकू उत्पादक, पान बीडी की दुकान, विक्रता चैनल से लेकर उपभोक्ता तक के हित अनहित का अंतिम सत्य बीमारी है, बीमारी हो या न हो लेकिन शारीरिक अक्षमता तो होनी तय है, यह भी बताया जाता है कि अति धूम्रपान से नपुंसकता की बीमारी के भी खतरे हैं, श्वांस रोग के लक्षण और उनके परिणाम तो सिगरेट के पैकेटों पर बने चित्रों और प्रचार माध्यमों में दिखाए जाते रहे हैं| सिगरेट के पहले हुक्का हमारे धुम्रपान का राष्ट्रीय प्रतीक था, वह हुक्का आजकल प्रीमियम क्लास उपभोक्ताओं का फैशन है जिसमे तमाम किस्म के नशे और स्वाद का हालिया चलन एक नयी ईजाद है| सूखे में कौन कौन से नशे मिलते हैं इस पर कोई औपचारिक आंकड़ा मौजूद नहीं, लेकिन नए लड़के लड़कियों के लिए यह एक बड़ा आकर्षण बन रहा है| हुक्का बारों की वैधानिकता के लिए सरकारी तौर तरीके से ज्यादा असरकारी बारों का मादक माहौल होता है जहाँ मंद मंद संगीत से लेकर मादकता के नए आयाम चखने को मिल रहे हैं| वैधानिकता में सरकार कितनी फिसड्डी है ये आकलन करने वालों के लिए नए दौर के लोगों की निजता के मायने भी जान लेना जरुरी है| निजता की गलतफहमियों का ये दौर नशे के कारोबारियों के लिए अवसरों के दरवाजे खोलता है| कारोबारी तौर पर सरकारी इजाजत और रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता हो या न हो लेकिन निजता के मानकों का टोटा इस कदर है कि कई बार शराब पीकर बहकना और रेहड़ी वालों पर रौब दिखाना अमीरी की एक निशानी बन रहा है| लेकिन शहर के नामी और सफेदपोश माफिया नशे के कारोबार की बदौलत इज्जत और रसूख खरीदने की कवायद में लगे हैं, एक तरफ शराब का कारोबार करके आबादी बिगाड़ने का काम है तो दूसरी तरफ गौशाला, स्कूल, अस्पताल और धर्मार्थ व्यवस्थाएं| लेकिन सच्चाई तो यही है कि व्यवस्था की इस कॉकटेल में किन्ही साहेबान के दायें हाथ से दक्षिणपंथ और बाएं हाथ से वामपंथ चलता है|
फ़िलहाल लोगों की निजता जरुरी है कि सेहत ये काम तो सरकार को तय करना है, पहले नशा इतना आम नहीं था, गांजा-भांग-अफीम आदि मंदिरों के जिम्मे था जिनका आयुर्वेद में बहुत प्रयोग होता था, तम्बाकू और हुक्के का चलन कितना पुराना है कभी जाकर पता करिए तो उसकी तस्वीर भी मिल जाएगी| ताड़ी-शराब-कंट्री बड़ी स्थानीय चीज थी, जिसे प्रयोग करने वाले अपने हिस्से की आजादी से इस्तेमाल करते थे, इन सब में कॉर्पोरेट लालच की अंधी दौड़ नहीं थी| जब से अफीम आई तब से सिंडिकेट शुरू हुए, उसी अफीम के पैसे से शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन का पहला प्रयोग हुआ, चीन में अफीम के डेन बनाये जाने लगे हुक्का बार की तरह शुरुआत में मजा आता था, फ्री पिलाने का दौर भी चलता था, बाद में लोग लती हो गए तो राजा को युद्ध लड़ना पड़ा| इसी अफीम के कारोबार में हिंदुस्तान के साथ चीन के दो युद्ध हुए| इसी कारोबार में अंग्रेज परस्त चीनी माफिया भी पैदा हुआ और हिन्दुस्तानी माफिया भी| आपके शहर में अफीम कोठी है, जाकर पता कर लीजिये वहीँ पर चीन के लिए अफीम सप्लाई का स्टॉक एक्सचेंज था| कुल मिलकर हिंदुस्तान की अफीम से चीन का शिकार हुआ| लेकिन शराब के मामले में ये प्रयोग हिंदुस्तान में ही हुआ, पहले विदेशी शराब यहाँ के रईसों की शान बनी, शुरुआत में आम आदमी के लिए सपने जैसी थी| उन रईसों ने शराब की कमाई से शिक्षा जगत का उद्धार करने की सोची, शराब के रुपये से शिक्षा जगत की नयी व्यवस्था का खाका तैयार हुआ तो उसमे से नए बुद्धिमान निकले, उन्होंने शराब पीने को निजता से दिया| फ़िलहाल की व्यवस्था में शिक्षा व्यवस्था लाभदायक साबित नहीं, लेकिन जरुरी मानी जाती है| इसलिए उसकी बदहाली के बावजूद उसको ढोते जाना सरकारी दायित्व है| अब सरकारें तो कर्जे में चल रही हैं और शैक्षिक संस्थानों की जो हालत है उसमे कोई कर्ज देगा भी तो क्यों? ये तो पता करिए कि देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रदेश की प्रोविंशियल एजुकेशन सर्विसेज के आला अधिकारियों से लेकर शिक्षकों के वेतन का देनदार कौन सूरमा है? खैर ये पता चले तो नशे की सिंडिकेट के पाप धुलने जैसी बात नहीं| शराब कोई नई ईजाद नहीं लेकिन शराब पोषित शिक्षा व्यवस्था जरुर है| जिसमे शराब की हालत भारतीय आयुर्वेद की एक सौतेली बदचलन लड़की जैसी है जिसे पहली दुनिया के आशिकों ने हिंदुस्तान के बाज़ार में उतार दिया, अब सर चढ़ के बोल रही है, हमारे अपने बच्चे पढ़ाने का जिम्मा उठा रही है| शराब तो पहले से ही हमारी व्यवस्था का हिस्सा थी, तब भी पीने पर पाबन्दी तो नहीं थी, पारिवारिक अनुष्ठानों में सामूहिक तौर पर पीने की व्यवस्था तक मौजूद है| शास्त्रीय सन्दर्भों में देख लीजिये| कौलिक तंत्र में घोषित रूप से निजता और साधना दोनों के लिए मांस, मद्य, मैथुन, मत्स्य और मुद्रा ये घोषित पञ्च मकार हैं, ये तो गृहस्थ की वामाचार साधना के अभिन्न अंग रहे हैं| सिंडिकेट के बाद नया क्या हुआ कि शराब की कमाई से कार्पोरेटी लालच और हमारी नयी शिक्षा प्रणाली का जन्म हो गया| एक समय के बाद इस नकली शिक्षा व्यवस्था से डिमांड और निजता के नए नियम निकले| इस डिमांड और निजता की आड़ में शराब माफिया और चीनी चीनी मिलों का सिंडिकेट खड़ा हुआ| ये एकदम ताजी घटनाएँ हैं, बमुश्किल सत्तर से सौ साल का इतिहास है| वैध और अवैध मिलकर सिस्टम और निजता के आपसी सम्बन्ध तो यही हैं, आप भी अपनी निजता के मानक बताएं तो बात की जाए|
निजता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए किसी कविवर की अद्वितीय लेखनी का एक कमाल ये भी है|
'गंग भंग दुई बहन हैं, रहत सदा शिव संग। पाप निवारण गंग है, होश निवारण भंग।''
‘गंग भंग दुई बहन हैं, रहत सदा शिव संग। पाप निवारण गंग है, होश निवारण भंग।’’
निजता का सीधा अर्थ पूरे होशो हवास में तय होता है बदहवासी में नहीं, निजता के लिए एक मानक ईमानदारी भी है, जिसमे अपने शरीर, अपने लोगों, घर-परिवार रिश्तेदारों के लिए इमानदारी एक बुनियादी जरुरत है| यही जरुरत देश के लिए भी है लेकिन अखबारी किस्से कहानियों और शिक्षा जगत की देन है कि जुमले और स्पष्टीकरण की नयी परंपरा ईजाद हो गयी| ये जुमलेबाजी कौन सी पहचान बनाएगी ये सवाल समय पर छोड़ते हैं, लेकिन द्रवीभूत मादकता की तो गंध भी अलग पहचान लिए होती है| अब जुमलेबाजी धुम्रपान यानि सूखे या काले का असर है या विजया श्री का ये तो तहकीकात का विषय है|
आपकी निजता में देश के लिए क्या जरुरी है, सेहत, शिक्षा, निजता या नशा ?
फ़िलहाल तहकीकात तो अपने वश में नहीं लेकिन हिन्दू परंपरा की एक विलक्षण उपलब्धि आपके हवाले करता हूँ,
कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय
या खाए बौराए जग वा पाए बौराए|
तरक्की और निजता की एक नजीर ये भी देखते चलिए ....

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