शायद ही कोई इस बात से इनकार करे कि कानपुर के इस देश को हिंदी पत्रकारिता सिखाई है, क्रांतिकारियों का कारखाना लगा के देश को आज़ादी के लिए लड़ना सिखाया है, कानपुर में एक पत्रकार की हत्या का अर्थ इस देश की पत्रकारिता की हत्या सरीखा है| आज पत्रकार खौफ के साए में जी रहा है और अपराधी बेख़ौफ़ है, उस पर तुर्रा ये कि हमारी अपनी सरकार ने देश में सबसे ज्यादा लोगों के एनकाउंटर का तमगा हासिल किया है|
यह समय सरकार और व्यवस्था को कोसने भर का नहीं, यह दोगुनी दिलेरी दिखाने का समय है| दीनदयाल दयाल उपाध्याय के जन्मशताब्दी का वर्ष है, वो कहते थे कि यह देश भावनात्मक एकता पर आधारित भौगोलिक इकाई है| बात सोलह आने सच थी और आगे भी रहेगी| बिना हमदर्दी के देश का क्या मतलब रह जायेगा? जाहिर है कि आज इस देश- समाज के लिए दिलेरी और हमदर्दी की दवाई जरुरी है| जानकार बताते हैं कि पहले जब कोई दिलेर मर्द होता था तो वह सरकार से जूझ के भी समाज के लोगों की हिफाजत करता था| औरतें उसके नाम की चूड़ी पहन के भी अपनी आबरू बचा लेती थीं| ऐसे लोगों से कुछ तो बेवजह रिश्तेदारी ही बना लेते थे| उस दौर में माँ बहिनों की इज्जत बचाने के लिए पर्देदारी और घूँघट भी ईजाद हुआ| शायद ये भारत देश की सहिष्णुता का भी आयाम लगे! जो गावों में आज भी जारी है| फिर अंग्रेजी गुलामी आई| गोरों ने गुलाम मारवाड़ियों के सोने का इस्तेमाल करके पैसे को समाज का बाप बना दिया| उसके बाद गोरों ने हिंदुस्तान में कागज का रूपया चलाया| जब मारवाड़ी अपना सोना गिरवी रख के कागजी रुपये के पुजारी बने, तब जाकर उनको सरकारी खैरख्वाही मयस्सर हुई| फिर क्या था, कागज से रूपया बनते ही मुल्क की बहुजन आबादी एकदम से गरीब हो गयी| बहुजन अवाम की माँ जैसी जमीनों की शामत आ गयी| कागज के कोठों पर इस देश की धरती की बंदरबांट शुरू हुई| उस बंदरबांट को कानूनी जामा पहना दिया गया था| धीरे-धीरे कागज की नाव पर सरकार भी चल निकली| तमाम लोगों ने कागज के रुपये को तो अपने सगे बाप से ज्यादा जरुरी मानना शुरू कर दिया| लेकिन इसी कागज से जब अवाम रूबरू हुई तो कागज कवियों, कथाकारों की जबान बन गया| जब छापेखाने में लोगों की हिस्सेदारी बनी तो कागज कवियों कथाकारों की जुबान अवाम में पहुंची| प्रताप सरीखे अखबारों और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों की बदौलत कागज ज्वलनशील हो उठा| जब आग उगलते अक्षरों की आंच अवाम तक पहुंची तो लोगों ने तपिश महसूस की| यही तपिश आन्दोलन बन के जंगल की आग की तरह फैली| घर-बार-रोजगार-व्यापार-परिवार तक छोड़ के लोग आगे आये, आन्दोलन में शामिल हुए, लड़े, गोली खाई, जेल गए, बेजार हुए| लेकिन वो इतिहास में दब गए नींव के पत्थरों की तरह| तब अख़बारों ने उन्हें बताया था कि उसी नींव पर आजाद भारत की ईमारत खड़ी होनी है| उन कागजों की बदौलत कलम से क्रांति सुलगाने वालों की पार्टी, परिवार, रोजगार, व्यापार, सपने, तरक्की, ज्ञान-विज्ञानं सब ये देश ही था| वो इसी देश के लिए जिए, जूझे और लड़े| देश आजाद हुआ तो शायद उन्होंने राहत की सांस ली होगी, लेकिन कागज कलम और अख़बारों ने फायदे के कारोबार में बदलने की दौड़ लगा दी| इस दौड़ में कमोबेश अख़बार कागजी मारवाड़ियों की रखैल साबित हुए तो पत्रकारों ने दलाली का रास्ता पकड़ा| कवि, कथाकार और कलमकारों ने इसकी खिलाफत की लड़ाई लड़ी तो, लेकिन अपनी हिम्मत हैसियत| वो जिन्दा लोग थे को लड़ते-लड़ते तो एक-एक करके सो गए| लेकिन आज किसी को किसी के जीने मरने की फिक्र भी नहीं, आज तो पत्रकार भी आज़ादी से ही रंजिश मान बैठे हैं| आज एक-एक करके जिस तरह से दिए बुझ रहे हैं उससे लगता है कि आगे अँधेरा है, गुलामी है| फिर भी उम्मीद है कि कोई दिलेर मर्द आएगा और हम उसके नाम की चूड़ियाँ पहन के अपनी आबरू बचा लेंगे, लेकिन अँधेरा ही जारी रहा तो देश का क्या होगा|

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