कानपुर नगर के सरकारी
महकमे कूड़े में भी फिसड्डी हैं और उसी के चलते गाय कूड़े के ढेर पर नजर आती है| कानपुर में पांच सौ से ज्यादा दुग्धशालाएँ यानि चट्टे है| उसकी बदहाली में भी गाय कूड़ा घर में दिखाई देती है| कानून बना था कि शहर के भीतर
मौजूद दुग्धशालाओं की व्यवस्था नगर निगम
करेगा| कूड़े की कवायद में उसने ये काम बंद कर दिया| आज गाय कूड़ा ही नहीं खाती बल्कि जो गोबर करती है वह शहर की
नालियों में बहकर गंगा में भी गिरता है, कानपुर
की गंगा के गुनाहगारों के तौर पर टेनरियों को दोषी कहा जा रहा है| मेरा दावा है कि आप एक बार जल निगम, जल संस्थान, केडीए किसी भी
विभाग को देख लीजिये उनके पास भी ब्लेम गेम भर ही है, ठोस जवाब नहीं| केन्द्रीय
पोल्लुशन कण्ट्रोल बोर्ड और एनजीटी किसी से भी या पूछने की हालत में नहीं कि वे
दुग्धशालाओं के नियमितीकरण में क्यों विफल साबित हो रहे हैं| न ही किसी को इस बात की परवाह है कि गाय हो या आदमी उसकी भूख मिटाने के लिए अधिकार संपन्न नौकरशाह विवेकशून्य
क्यों साबित हो रहे हैं? क्या सच में
उन्हें जनता के साथ छल करने में मजा आ रहा है? क्या सच
में वे गायों की बदहाली से, कुत्तों की
बीमारी से,
गिद्ध और गौरय्या के गायब होने से आहत नहीं| अगर ऐसा है तो गाय की जो अनदेखी सरकारी महकमों में है उसको भी
आप लोग भ्रष्टाचार क्यों नहीं कहते| गाय की
बदहाली से आहत अतुल तिवारी रवि शुक्ला अगर अवाम तक जा सकते हैं तो पशु धन अधिकारी
और पशु चिकित्सा अधिकारी क्यों चूड़ियाँ पहने बैठे हैं? और अगर वे चूडिया पहने बैठे हैं तो हमारे नेता लोग कुछ करते क्यों
नहीं? और अगर नेता और पार्टी वाले कुछ करने में नाकाम हैं
तो वे गाय के साथ महज फोटो खिंचा के क्यों मुख्यंमंत्री-प्रधानमंत्री बने बैठे हैं? कथनी करनी का यह मौलिक फर्क क्या यह सरकारों के लिए बेहतर छवि
बनाएगा? मुझे नहीं पता कि मुस्लिम के गाय की क्या हालत आपने देखी है
लेकिन हमारे शहर में ही नहीं इस मुल्क के निज़ाम ने फरमान जारी करके गाय के क़त्ल को
रोका है, इतिहास गवाह है| आज अगर नेता और निज़ाम को बदहाली के लिए जिम्मेदार नहीं मानेंगे तो क्या कंपनी और सरकार को क्लीन चिट देकर आप गाय बचा लेंगे? हिन्दू-मुसलमान वाली आधी अधूरी तस्वीर
से गाय भी आधी अधूरी ही बचेगी? बचाते रहिये|
निजी तौर पर मै ऐसी ग़लतफ़हमी से बचता हूँ जिसमे हिन्दू की गाय, मुसलमान की गाय, सिख की गाय या इसाई की गाय की बात
हो... इस देश में गायों के लिए बेरहमी माफ़ नहीं की जा सकती आप जिस मुगालते में गाय
के मामले में सिर्फ और मुसलमान गुनाहगार की नजर से देखते हैं वह बाकी धर्मों और देश को नजर अंदाज करने का एक बड़ा उदहारण कहा जा सकता है| इस अनदेखी का हश्र है कि अमूमन शहरों में ही नहीं गावों में
भी कूड़े पर मुंह मारती गाय नजर आ ही जाती है| गाय की
आदमी के लिए क्या अहमियत है यह सेल्फी वाले फोटो या किताबी बातों में खोजेंगे तो
जवाब मिलना मुश्किल है| लेकिन गाय हमारे जीवन को व्यवस्थित कैसे कर सकती है वह देखना चाहते हैं तो
आपको गाय पालनी पड़ेगी और उसकी फ़िक्र करनी पड़ेगी| जाड़ा गरमी बरसात में सुबह उठ कर चारा देना पड़ेगा| अपने तरह न सही लेकिन एक छत भी देनी पड़ेगी| लेकिन इतना जरुर है धर्मपत्नी जी की तरह वो भी आपका जीवन
व्यवस्थित करने में मदद ही नहीं करेगी आपको समय का पाबंद भी बना देगी| समय का सदुपयोग कर सके तो गाय एक कल्पवृक्ष ही साबित होगी| एक घर को आत्मनिर्भर करने में सिर्फ 2 साल की कारगर कवायद करने की देर है, गाय हर घर को और पुरे देश को सक्षम और सम्पन्न बना सकती है| आज यदि कोई गाय की
फिक्र नहीं कर पा रहा तो यह और भी दयनीय परिस्थिति है| इस दयनीय परिस्थिति में योगी जी ने खुद गाय पालने की नजीर बनाई उसके बावजूद गायों की दीगर
बदहाली हमारे देश का ताजा सच है| जाहिर है कि यह
सच्चाई समाज को बेचैन कर रही है| आज राहुल जनेऊ
पहनते हैं और पूरे देश में ब्राह्मण की बेजा बहस होने लगती है| यह नेता का मीडिया और देश पर असर है| अगर राहुल किसी गाय को पाल बैठते हैं तो भाजपा वाले क्या मुंह दिखायेंगे? मुसलमान
को गाय के लिए जितना बड़ा गुनाहगार दिखाते हैं वह अधूरा सच है, उस सच का एक दूसरा हिस्सा बीफ निर्यातकों की फेहरिस्त भी है, उस पर बहस नहीं, क्या
वजह है? फेहरिस्त में कौन-कौन शुमार हैं वह किसी से छुपा नहीं| प्लास्टिक देश की जरुरत घोषित कर दी गयी और शहरों में कूड़े के
अम्बार खड़े हो गए| उसी कूड़े के
अम्बार पर जब गाय नजर आती है तो गाय और मुसलमान करते हैं, जबकि गाय सबकी है और मैंने हर तबके को गाय पालते देखा है| कूड़ा फैलाना अपराध माना जाए ये कहना है मेधा पाटेकर के
समर्थकों का|
शायद ही कोई हो जो इसे मना कर सके, लेकिन यह कानून बन गया तो अवाम के शोषण का औजार ही साबित
होगा| जब गाय की बात करनी हो तो आपको आधी
अधूरी सच्चाई के बजाये पूरी तस्वीर साफ़ साफ देखने की जरुरत है|
देवेन्द्र चौधरी मानते हैं कि गाय के विषय में जो प्रोजेक्ट लाभकारी बताए गए हैं वे विचार से तो वे लाभकारी नही है| गहराई में जाकर पता चला कि जमीन सरकार से फ्री लीज
पर, भूसा
चारे पर जिलाधीश से सब्सिडी इसके अतिरिक्त कमीशन पर समाज के सभ्रान्त वर्ग से
चन्दा उगाही फिर उत्पादन को मंहगी दर पर बिक्री यह काम समान्य व्यक्ति नही कर सकता। जाहिर है कि गाय की फिक्र कम और
नेतागिरी ज्यादा हो रही है|
गौरक्षा आन्दोलन के अगुवा सुरेन्द्र सिंह बिष्ट कहते हैं कि
देशी गोवंश की नस्लों को सरकार ने दो भागों में
बांटा है - दुधारू और अन्य कार्य उपयोगी।
पर देश में हुए 5 सफल प्रयोगों ने सिद्ध कर दिया है कि बाकी नस्लों को भी ज्ञान- विज्ञान के आधार पर फिर से दुधारू बनाया जा सकता है। अब तक जिन 5 नस्लों पर सफल काम हो चुका है वे हैं -
गंगातीरी, लाल कंधारी, कांकरेज, गंगायन और खिलार। इससे विश्वास हो गया है कि अन्य नस्लों को भी दुधारू बनाया जा सकता है। जो दुधारू हैं, उनके अनेक उदाहरण पहले से मौजूद हैं। जैसे गीर गाय की अहमदाबाद स्थित वंशी गोशाला। उन अनुभवों के आधार पर कुछ समर्थ लोगों को आगे आना है, जो लाभदायी गोपालन व्यवसाय के मॉडल्स स्थापित कर समाज का प्रेरित कर सकें|
पर देश में हुए 5 सफल प्रयोगों ने सिद्ध कर दिया है कि बाकी नस्लों को भी ज्ञान- विज्ञान के आधार पर फिर से दुधारू बनाया जा सकता है। अब तक जिन 5 नस्लों पर सफल काम हो चुका है वे हैं -
गंगातीरी, लाल कंधारी, कांकरेज, गंगायन और खिलार। इससे विश्वास हो गया है कि अन्य नस्लों को भी दुधारू बनाया जा सकता है। जो दुधारू हैं, उनके अनेक उदाहरण पहले से मौजूद हैं। जैसे गीर गाय की अहमदाबाद स्थित वंशी गोशाला। उन अनुभवों के आधार पर कुछ समर्थ लोगों को आगे आना है, जो लाभदायी गोपालन व्यवसाय के मॉडल्स स्थापित कर समाज का प्रेरित कर सकें|
सुरेन्द्र सिंह बिष्ट गोरक्षा आन्दोलन के अगुवा और पूर्व
भाजपा अध्यक्ष के.एन. गोविन्दाचार्य निकटम सहयोगी भी हैं| उनका निष्कर्ष है कि...
गोरक्षा के लिए गोशाला यह आपत्धर्म है,
युगधर्म है गोपालन व्यवसाय !
लाभदायी गोपालन व्यवसाय के मॉडल्स खड़े हों !!
युगधर्म है गोपालन व्यवसाय !
लाभदायी गोपालन व्यवसाय के मॉडल्स खड़े हों !!
लेकिन शायद वरिष्ठ हिंदूवादी सुरेन्द्र बिष्ट परंपरा और
इतिहास बोध में डगमगा जाते हैं, उनके मुताबिक हमारे यहां वैश्य के प्रधान कर्म बताएं हैं - 1) कृषि 2) पशुपालन 3) व्यापार और 4) कुशीद ( ब्याज) उनके लिए लाभ को परिभाषित करना और
व्यवहार में या व्यवस्था में लागू कर पाना मुश्किल मालूम होता है|
खैर व्यवस्था
रोजनामचे में चलती है, गाय को भी रोज
भूख लगती है| इसलिए पहले चारा फिर कारोबार की नीति रखनी होगी| कारोबार के
नाम पर देखा जाए तो गोबर गैस प्लांट सबसे पहले हिंदुस्तान ने ईजाद किया, पूरी
दुनिया ने देखा,
लेकिन क्या गाय चारा खाए बिना गोबर करेगी? जैसे इन्सान लोग भोजन करते हैं वैसे ही गाय भी चारा रोज खाती है| लेकिन गोपालक लालू चारा खा गए पूरे देश ने देखा, जा के पूछिए ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय
हैं, वैश्य हैं या शूद्र| गाय की
पूरी की पूरी नस्ल बीफ के नाम पर निर्यात होती है वो भी देश ने देखा, जा के पूछिए की बीफ का निर्यात क्या सच में वणिक कर्मों में
आता है? गोबर गैस पर खूब गुरुज्ञान बंट रहा हैं, नौकरशाही के गुरु भी गावों की जीडीपी बढ़ाने पर अमादा हैं| कानपुर गौशाला सोसाइटी ने अट्ठारह सौ पचासी में गाय पालने की
व्यवस्था शुरू की| आज वहां पॉवर
प्लांट, गैस प्लांट, गौ-आयुर्वेद से
लेकर सौन्दर्य प्रसाधन के गौ उत्पाद सब मौजूद हैं, जाइए बनाइये मुनाफे, वो
इंतजार कर रहे हैं कि कोई आये और करे चमत्कार| तब भी
निकम्मे गाय पाल के आवारा छोड़ देते थे, हुकूमत
पकड़ के कांजी हौस में बंद कर देती थी, कोई
छुड़ाने आता था तो उससे जुरमाना वसूल के गाय अपने स्वामी के हवाले की जाती थी| अंग्रेज बहादुर पकड़ के कटवा देते थे, उसी पकड़ से उन्होंने चमड़े के कारखाने खड़े करवा दिए| ये कलंक आया मुसलमान के नाम, ज्यादातर पारम्परिक व्यवसायी थे, उन पारंपरिक व्यवसायियों का कलंक धोने में राम जी की गंगा भी
मैली हो गयी, ये कानपुर शहर
का विश्वविख्यात नजारा है|
सच तो यही है कि गाय को
दुनिया भर में व्यवस्था में जो दुत्कार आजकल मिल रही है वह अंग्रेजी हुकूमत की देन
है| जब से अंग्रेजी हुकूमत ने कत्लखाने खोले तब से गाय में हिन्दू
मुसलमान शुरू हुआ, इसकी दीगर गवाही
है अंग्रेजी ब्राण्ड के चमड़े के जूते जो आज भी हमारे लोकजीवन का हिस्सा हैं| गौहत्या के राजनीतिक विरोध का क्या स्तर रहा उसका
अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1857 में गाय और सूअर की चर्बी के कारतूसों की खिलाफत में विद्रोह
हुआ| विद्रोहियों का दमन करने के लिए उन्हें गौमांस खिलाया गया और
सूअर की खाल में लपेट के फांसी पर लटकाया गया| इतिहास
के ये जख्म उन्हीं ग्लोबल बनियों की ही देन हैं, जिनका कारोबार बदस्तूर जारी है, बस तरीका बदल गया है| नब्बे
के दशक में यूरोप में मैड काऊ डिजीज हुई, बड़े
पैमाने पर|
वजह थी ग्लोबल बनियों का लालच
जिसमे सेक्युलर वैज्ञानिकों के ख्याली पुलाव भी शामिल थे| पश्चिम में गौमांस का चलन है, उन्होंने गाय से दूध लेने के अलावा उसको लाभदायक बनाने की
कवायद जारी रखी,
जैसे आप जूझ रहे हैं शायद उसी तरह| वैज्ञानिकों ने गौमांस के बाद बचे व्यर्थ से चारा बनाना शुरू
किया| लाभ मात्र के लिए वह चारा जानवरों को दिया जाने लगा| जब उस चारे को गायों को खिलाया गया तो तत्काल में वह फायदे का
कारोबार माना गया लेकिन दीर्घकालिक तौर पर उससे खतरनाक परिणाम निकले| गौमांस वाला चारा खिलाने गायों में खास किस्म की बीमारी पैदा हुई| वह बीमारी
लाइलाज थी और करोड़ों गायों को मार कर उस बीमारी से निजात मिल सकी| गायों को तो मार दिया गया लेकिन उसके बाद दूध की बुनियादी
जरूरतों को पूरा कर पाना संभव नहीं था| तब
हिंदुस्तान से सांडों का वीर्य आयत करके नयी नस्ल तैयार करने की कवायद शुरू हुई| हिन्दुस्तानी नस्ल के सांडों को दक्षिण भारत उत्तर भारत और
लगभग सारे देश से एकत्र करके निर्यात करने का कारोबार खूब फला-फूला| आज की सरकारों ने इस कारोबार को अमली जामा पहनाने के लिए उसे
कानून की शक्ल दे दी है| इसी के साथ साथ
विदेशी नस्लों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसके
दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे ये तो वक़्त बताएगा| फिलहाल गायों के लाभदायक व्यापार के भूत के साथ साथ उन्ही
कंपनियों ने हिंदुस्तान की सरकारों को गुरु ज्ञान देना शुरू किया है, उन प्रोजेक्टों को देश की उर्जा आवश्यकताओं के साथ जोड़कर देखा
जा रहा है|
हमारी उर्जा आवश्यकताओं के लिए जो बाँध बने हैं उनसे नदियों की
बदहाली दीगर है| नदियों पर नीतिगत घालमेल हमारी
नैसर्गिक संपत्तियों को बर्बाद करने जैसा घृणित कृत्य है, लेकिन ये सब लाभ के लिए चल रहा है| बड़े-बड़े वकील और कंसलटेंट ईआईए-एसआईए और डीपीआर की कवायद
में मोटी तनख्वाह लेकर देश बर्बाद करने का विधान बना रहे हैं| अब कंपनियों ने अपने मानवतावादी संस्थानों और हमारे नौकरशाहों
के कंधे पर बन्दूक रख कर नया खेल रचा है| इस खेल
में उनका निवेश किस तरह का है इसकी जानकारी करनी हो तो किसी खाद बीज की दुकान या नर्सरी
म जाकर देखिये|
चीनी कंपनियों की खाद सवा सौ रुपये किलो बिक
रही है| हमारा गोबर, हमारी गाय हमारी
जमीन और लाभ किसका... कंपनी का| वही कंपनियां
उर्जा क्षेत्रों में अपने प्रोजेक्ट लगा रही हैं, जिसकी बिजली खरीद के हमारा सामाजिक विकास होगा| देश के लोग परंपरा की बहस में, हिन्दू-मुसलमान में सर खपा रहे हैं और कंपनी वाले गाय-गोरु-जमीन सब कब्जाए जा रहे हैं|
डीएफआईडी में डेवलपमेंट कंसलटेंट रहे डॉ. ओंकार मित्तल अपने
अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि
“सन 2001 का समय
था जब यूनाइटेड किंगडम में हज़ारों लाखों गो वंश को ज़िंदा जला दिया गया|
शायद खुरपका की महामारी को फैलने से बचाने के नाम पर।
मैं उस वर्ष लंदन में ही था। मुझे विश्वास नहीं हुआ कि मनुष्य जाति का एक हिस्सा इतना अंधा और क्रूर हो सकता है। मेने
देखा - जैसा आपने संकेत किया है- गाय को ये हड्डियों का चूरा
खिलाते हैं चारे के रूप में। 60 के दशक में ही - फ़्रान्स के लेखक
चार्ल्ज़ बथलम की यह थीसस आ गयी थी कि भारत में गौ वंश मात्रा
बहुत ज़्यादा है और इसको कम किया जाना चाहिए। कोसी बाँध बनने से
पूर्व लाखों गाय कोसी के मैदानों में मौजूद थी जो जल भराव के कारण नष्ट हो गयीं।
गौ वंश की रक्षा के इन व्यापक मुद्दों पर हम लोगों की तरफ़
से एक जाति और राष्ट्र के तौर पर कभी समुचित विचार नहीं हुआ।
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