Friday, December 29, 2017

जानिए सरकार ने क्यों कहा कि खतरनाक है बिटकॉइन

आतंकवाद, तस्‍करी, नशीले पदार्थों और कालाधन सफ़ेद करने में होता है बिटकॉइन का इस्तेमाल 

बिटक्‍वाइन और अन्‍य आभासी मुद्राओं पर सट्टेबाजी होती है

दुनिया भर में हो रही कालाबाजारी के लिए वित्‍त मंत्रालय ने आज आभासी मुद्रा’ के बारे में एक बयान दिया है। सरकारी बयान के मुताबिक ये मुद्राएँ खतरनाक रूप से देश की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकती हैं| 

जारी की गयी विज्ञप्ति में भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने माना है कि भारत और पूरी दुनिया में बिटक्‍वाइन सहित आभासी ‘मुद्रा’ की कीमतों में हाल में अभूतपूर्व बढ़ोतरी देखी गई है। आभासी मुद्राओं का अपना कोई मूल्‍य नहीं होता और न वे किसी परिसम्‍पत्तियों पर आधारित होती हैं। बिटक्‍वाइन और अन्‍य आभासी मुद्राओं पर सट्टेबाजी होती है, जिससे उनकी कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आता है। पोंजी स्‍कीमों की तरह आभासी मुद्रा में भी निवेश का बहुत जोखिम होता है, जिसके कारण निवेशकों को कभी भी अचानक नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्‍योंकि यह पानी के बुलबुले की तरह होता है। खासतौर से खुदरा उपभोक्‍ता अपनी गाढ़ी कमाई खो बैठता है। उपभोक्‍ताओं को सजग और बहुत सावधान रहने की आवश्‍यकता है, ताकि वे इस तरह की पोंजी स्‍कीमों के झांसे में न आयें। आभासी मुद्रायें डिजिटल/इलेक्‍ट्रॉनिक रूप में होती हैं और हमेशा हैकिंग, पासवर्ड, साइबर हमले जैसे खतरे मंडराते रहते हैं। इसके परिणामस्‍वरूप जमा पूंजी हमेशा के लिए नष्‍ट हो जाती है। आभासी मुद्रा का लेन-देन एनक्रिप्‍टेड होता है, जिसके कारण गैर-कानूनी और विध्‍वंसक गतिविधियां चलाने में आसानी होती है। इनके जरिये आतंकवाद का वित्‍तपोषण, तस्‍करी, नशीले पदार्थों की तस्‍करी और धन शोधन जैसी गतिविधियां चलाई जा सकती हैं।
आभासी मुद्रा को सरकार का कोई समर्थन प्राप्‍त नहीं है। इनमें कानूनी तौर पर कोई लेन-देन भी नहीं किया जा सकता, इसलिए आभासी मुद्रायें ‘मुद्रा’ के दायरे में नहीं आतीं। इनका उल्‍लेख ‘सिक्‍कों’ के रूप में भी किया जा रहा है, जबकि ये चलन वाले सिक्‍के नहीं हैं। इस आधार पर आभासी मुद्रा न तो सिक्‍का है और न मुद्रा। भारत सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक ने आभासी मुद्रा को लेन-देन के लिए अधिकृत नहीं किया है। सरकार या भारत में किसी भी प्राधिकार ने किसी भी एजेंसी को ऐसी मुद्रा के लिए लाइसेंस नहीं दिया है, इसलिए जो व्‍यक्ति आभासी मुद्रा में लेन-देन करता है, उसे इसके जोखिम के प्रति सावधान रहना चाहिए।
आभासी मुद्रा को इस्‍तेमाल करने वालों और उनके कारोबार में संलग्‍न लोगों को दिसम्‍बर, 2013, फरवरी 2017 और दिसम्‍बर 2017 में भारतीय रिजर्व बैंक ने सावधान किया था। भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा था कि यह आभासी मुद्रायें वित्‍तीय, वैधानिक और सुरक्षा संबंधी मामलों के लिए खतरनाक हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने यह भी स्‍पष्‍ट किया था कि उसने बिटक्‍वाइन या किसी भी अन्‍य आभासी मुद्रा के लेन-देन और संचालन के संबंध में किसी भी कंपनी या एजेंसी को न तो लाइसेंस दिया है और न उन्‍हें अधिकृत किया है। भारत सरकार ने यह भी स्‍पष्‍ट कर दिया है कि आभासी मुद्रायें लेन-देन के लिए किसी भी प्रकार वैधानिक नहीं है और उन्‍हें कोई भी कानूनी अनुमति नहीं दी गई है। आभासी मुद्राओं में निवेश करने वाले और अन्‍य भागीदार अपने जोखिम पर लेन-देन करते हैं और सबसे अच्‍छा तरीका यही है कि इस प्रकार के किसी भी लेन-देन से बचा जाए।

Tuesday, December 26, 2017

क्या देश का सविधान बदलने की कवायद में है सत्तारूढ़ भाजपा?

एक सम्मानित अख़बार में छपे केन्द्रीय मंत्री के बयान पर समाज के वर्गों से एक तीखी प्रतिक्रिया मिली है| वरिष्ठ दलित चिन्तक लालजी निर्मल ने खबर की तस्वीर सोशल मीडिया में साझा करते हुए संविधान में बदलाव के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी है| जिसमे संविधान के बदलाव पर विरोध मुखर हो उठा है| लालजी निर्मल ने केन्द्रीय मंत्री के इस बयान पर तीखी आपत्ति दर्ज कराते हुए कहते हैं कि अपनी जाति पर नाज करने वाले दलित और पिछड़े यह जान लें कि जाति को कायम रखना हेगड़े के लिए जरूरी क्यों है।लालजी निर्मल का मानना है कि जाति बहुजनो के लिए नाज करने का नहीं वरन त्याज्य करने और हतोत्साहित करने का विषय है। साथ ही उनका ये भी मानना है कि जो दलित पिछड़े लीडर्स अपनी जातियों की राजनीति कर रहे है वे बहुजन एकता और अम्बेडकरी मिशन के दुश्मन हैं । इतना ही नहीं जातिवादी राजनीति के पैरोकारों के लिए उन्होंने खुला आरोप लगाया है कि वे परोक्ष रूप से हेगड़े की विचारधारा को मजबूत कर रहे हैं। ब्राह्मणों को खुश करने के लिए बयान दिया है ! अथवा जतियाँ और उनके बीच की खाइयों को बरकरार रखकर सवर्णों के हित की बात ध्यान रखी गई है ! ये मानना है दलित  चिन्तक विनोद कुमार का| 
राजस्थान यूनिवर्सिटी से दलित चिन्तक रविन्द्र मेघवाल ने और ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया दी है, उनका मानना है कि गिरगिट अपना असली रंग दिखा गया l यह एक कुटिल चाल के तहत हो रहा है और हम है की आँखे बन्द करके इसे सिरे से नकार रहे है आखिर सविधान तो कोई माई का लाल बदल ही नही सकता l  अगर बदल दिया तो क्या कर लोगे? केन्द्रीय मंत्री के इस बयान पर तकनीकी विशेषज्ञ दिला सिंह का सवाल संविधान की बुनियादी फिक्रमंदी से जुड़ा है, वो सवाल करते हैं कि क्या यह बयान संविधान में दिए मौलिक कर्तव्यों के विरुद्ध नहीं है ,जिसमें प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है कि वह संविधान का सम्मान करे ? मोदी सरकार के मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने ब्राह्मण युवा परिषद के सम्मेलन में संविधान को बदलने की बात की. वहां एक भी देशभक्त ब्राह्मण ऐसा नहीं था, जो उठकर बोलता कि मंत्री जी आप गलत बात कर रहे हैं.यह कहते हुए जवितेश सिंह ने भाजपाई ब्राह्मण समुदाय पर करार तंज कसा है | 
हालाँकि एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि देश का संविधान राष्ट्रीय प्रगति की गतिशीलता का आधार है| सामाजिक कार्यकर्त्ता राकेश मिश्र विद्यार्थी ने दलित विद्वानों के संशय पर व्यंग्य किया है कि संविधान न हो गया मंदिर का भगवान हो गया... आप लोग भी संवैधानिक छुआछूत फैलाये जा रहे हैं, देश, काल, परिस्थितियों के मुताबिक संविधान बदलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है... जो बहुमत लेकर राज करेगा वो कानून बनाएगा तो संविधान बदलेगा ही, कुछ नया जुड़ेगा, कुछ बेहतरी भी होगी| लगता है कि आप लोग संविधान को जड़ और व्यवस्था को मंदिर के पत्थरों की तरह मुर्दा साबित करने में लगे हैं? क्यों भाई... ऐसी ज्यादती की क्या वजह है? 
लेकिन संविधान सबका विधान है और उसमे हेर-फेर पर फिक्रमंदी  दलित दलित ही नहीं हर वर्ग की सोच में होना लाजिमी है| ब्रज बाला के मुताबिक संविधान बदलिए जरूर मगर सबको बराबर के हक के साथ। उनके मौजूं सवालों में यह कहना लाजिमी है कि कोई क्यों एक ही धर्म में जातियों के दरारों में दबे? किसने मना किया है करिये ना जातियों को रफा दफा करने की बातें संविधान में अपनी गोष्ठियों में सेमिनारों में। जातियों की ऊंच नीच वैसे भी देश के इतिहास पर गुलामी का काफी बोझ डाल चुकी है। चाहे वह बाहर वालों की थी या अंदर वालों की। अगर आप जातियां कायम रखते हुए धर्म के आधार पर संशोधन की बात करते हैं तो यहा नीयत की परोक्षता पर किसी अनपढ को भी शक हो सकता है। धर्म-निरपेक्षवाद के साथ साथ जाति निरपेक्षता की बात क्यों नहीं? लेकिन संविधान की अपनी विडंबनायें हैं, कुछ नजीरें देखिये, पहली दिक्कत देश तो की विधायी निरक्षरता है,  इससे निपटने के लिए अभी तक कोई औपचारिक व्यवस्था साकार हुई भी तो उसको आखिरी आदमी तक पहुँचाने में कितने सौ साल लगेंगे ये सवाल दूर की कौड़ी है| ये विधायी निरक्षरता इस कदर है कि कोई कहे कि कौव्वा कान लेकर उड़ गया और आप कौव्वे के पीछे दौड़ लगा दें, ऐसा नहीं चलेगा| शुक्र मानिए कि संविधान आज़ादी के इकतालीस सालों तक अंग्रेजी में रहा तब भी लोगों ने उसे स्वीकार किया, मै होता तो कह देता कि किसी गोरे के कब्र में गाड़ दीजिये ऐसे संविधान को, गौरतलब है कि संविधान का औपचारिक हिंदी अनुवाद 1988 में हुआ| आज भी सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेजी में जिरह होती है, अक्सर उस जिरह का मतलब न तो वादी को पता होता है और न ही प्रतिवादी को, जरा बताएं तो ऐसे संविधान का क्या तुक जिसमे अपनी भाषा में न्यायिक प्रक्रिया तक सहज सुलभ न हो, लेकिन हम झेलते हैं| संविधान के नाम पर कानून तो लोकसभा,  विधान सभा और स्थानीय निकायों तक की बैठकों में लगभग रोज बनते हैं जबकि  अनपढ़ अवाम के साथ इससे बड़ा छल क्या होगा कि 99.99%  इस देश की 99.99% आबादी को कानून का ककहरा तक पता  नहीं| इसके बावजूद हम मानते हैं कि यह देश संविधान से चलता है| जानते हैं दलित और संविधान का क्या रिश्ता है, दलितों के साथ एक खूबसूरत मजाक हुआ, मलिन बस्तियों और दलितों के गाँवों के पास एक मूर्ति बनी जिसमे अक्सर नीला कोट पहने हाथ में एक किताबनुमा कोई चीज लिए एक आदमी किसी दिशा में ऊँगली दिखाता है| उस मूर्ति को अम्बेडकर कहा गया और उस किताबनुमा चीज को संविधान| संविधान और अम्बेडकर का बस इतना मतलब है, न किसी को किसी ने कानून बताने सिखाने की कोई कोशिश करता है और न ही देश के संघीय ढाँचे की कोई जागरूकता बन पायी| कितने चिंतकों, फिक्रमंदों, नौकरशाहों, नेताओं दलितों के मसीहाओं ने विधायी साक्षरता को लेकर पहल की? कितने राजनेता  अपने क्षेत्रों में कानून बताने जनता को लेकर बैठे? चलिए यही बता दीजिये कि कितने दलित राजनेताओं ने समुदाय विशेष की विधायी जागरूकता की कोई पहल की|  फिर भी ये देश के लोगों की बुनियादी समझदारी है कि देश में सभी भले ही अदालतों के चक्कर लगा के, वकीलों से लुट पिट कर उन्होंने व्यवस्था का अनुभव किया हो, सभी मानते हैं कि यह देश संविधान से चलता है| राकेश मिश्र विद्यार्थी  ऐसे सभी लोगों से हाथ जोड़कर एक निवेदन करते हैं कि  महाराज असल की फसल उगाइये, आरक्षण संविधान और अम्बेडकर भी जुमले बन जायेंगे तो बड़ी आफत खड़ी हो जाएगी| कुछ न कर सकें तो अपने अपने लोगों को संविधान के लिए जागरुक करिए| नगर-नगर और गाँव-गाँव में ये काम संविधान कथा बांचने का काम एक अकेला सूरमा कर रहा है,  गिरीश नारायण पाण्डेय| वो भी इसलिए क्योंकि बेजा आरोप -प्रत्यारोप में समय की बर्बादी से इस देश को बचाया जाए| लोगों में अपने कानून और संविधान की समझ बनेगी तो आम लोग भी अपने हितों के लिए अपने हको हुकूक के लिए लड़ तो सकेंगे|  
राकेश मिश्र विद्यार्थी कहते हैं कि दलित चिन्तक जातियां मिटाने में जान दिए देते हैं, वे बताएं तो कि धर्म निरपेक्ष का ये अर्थ कहाँ लिखा है कि व्यक्तिगत और सामुदायिक पहचान के सारे पैमाने मिटा दिए जाएँ| जब संविधान सभी तरह के समूहों को अपनी संस्कृति के लिए आज़ादी देता है तो आपको अपनी संकृति और सामाजिक सुरक्षा के लिए आज़ादी से कौन रोक रहा है? जातीय विषमताएं इसी संविधान के बुनियादी अवधारणाओं में समाहित हैं| जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषाई और लिंगभेद के आधार पर कानून तो कोई फर्क नहीं मानता| हाँ अगर दलित चिन्तक लोग  दिल में कोई निजी लोड लिए बैठे हों तो उसका इलाज मुश्किल है| जातियां ही नहीं भाषाएँ भी कायम रहें, लिंग, संप्रदाय और सामुदायिक व्यवस्थाएं भी कायम रहें, लेकिन किसी के साथ भेदभाव न हो, ये संविधान महज इतने मकसद के लिए बना है| यही संविधान का बुनियादी आधार है कि सामुदायिक और सामाजिक व्यवस्था में किसी के साथ फर्क न हो, लेकिन ऐसा नहीं होता है तो आप अपनी आपत्तियां दर्ज करवा सकते हैं, लेकिन उसका पैमाना भी देना होगा| वह पैमाना जो बहुजन हिताय बहुजन सुखाय से ऊपर उठकर सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय को प्रतिध्वनित करता हो|
हालाँकि तमाम स्वीकारोक्तियां दलित चिन्तक ब्रज बाला के इस बयान में भी दर्ज है जिसके मुताबिक जब दलित लोग मिथक गहनों से लदी फदी मूर्तियो के प्रेम में दीवाने हो झूम सकते हैं, गा बजा सकते हैं, और हां समय समय पर लज्जित भी हो सकते हैं, तो किताब थामें नीला कोट पहने मूर्ति तो फिर भी शिक्षापरक वास्तविकता के नजदीक है। उंगली की दिशा भी उन्नत दिशा में है । न कि और मूर्तियों के हाथ का पंजा सीधा रख सामने की ओर कि जैसा है वैसा ही स्वीकार कर लो आशीर्वाद समझकर। 
लोगों ने एक कपङे के गाँधी और दस लाख के कोट में प्रधानमंत्री को भी हाथों हाथ लिया है। एक वर्ग ने तो गाँधी के हत्यारों को भी पूजा है। 
यही भारत की विशेषता है कि उसने समय के साथ सबको स्वीकारा है।यही सबसे अलग करता है।
जरूरत आमजनता को संविधान हिंदी में समझाने की नहीं वरन् अपनी राष्ट्भाषा के प्रति जागरूकता की है। जिस दिन सारे अंग्रेज़ी स्कूल बंद हो जायेंगे आप अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढाना बंद कर देंगे तो यकीन मानिए उसी दिन वकीलों की जरूरत बंद हो जायेगी, आपके आने वाली पीढिया भारत की विविधता को ठीक से समझ पायेंगे।  और जरा प्रकाश डालेंगे कि ये व्यक्तिगत और सामुदायिक पहचान के पैमाने किसने बनाये हैं? पैमाने बनाने वालों की नजर में मानव मानव में भेद कैसे हुए? 
छोटे बङे होने की अवधारणा कैसे पनपी? क्यों इन पैमानों को बनाये रखने पर आपकी पुरजोर कोशिश है? क्या  फिर से किसी गुलामी की दस्तक महसूस किया जाये? या फिर मुस्लिमों और अंग्रेजों के शासन से उबरने के बाद फिर से उनके आने से पहले वाले समय मे जाने की चाहत है? लेकिन क्या मिलेगा पीछे जाकर जबकि वही व्यवस्था की अव्यवस्था ने देश की कमर तोङ दी थी भले ही आप दूध की नदियां बहने के मुगालते में रहें। दूध की नदियां सचमुच बहीं होंगी लेकिन उन लोगों के घर में जो मुख्यतः मेहनतकश थे और दुधारू  जानवरों को जैसे कि गाय और भैंसे पालकर समाज में दूध की पूर्ति कर रहे थे। लेकिन यहां ध्यान रखा जाये कि गाय और भैंस में भी भेदभाव कर दिया गया है। इसलिए आज संविधान में हर धर्म हर जाति हर परिवेश पर अनुच्छेदों की जरूरत पङी। वैसे भी जैसे शंकराचार्य की पदवी रिजर्व है वैसे ही संविधान संसोधन की बात करना दलितों पिछङों की सन्मति के वगैर हो न पायेगा। ये अलग बात है कि उन्हें साम दाम दंड भेद कौन सी नीति के तहत हैंडिल किया जायेगा। ये लोग इतना तो समझने ही लगे हैं। ऐसा नहीं है कि अवसरवादी दलितों में नहीं हैं लेकिन इतने कम हैं कि दिख जाते है अलग से दलित समाज में और दलित समाज उनकी भी भर्तस्ना करने से नहीं चूकता। 

देश के लिए क्या जरुरी है, सेहत, शिक्षा, निजता या नशा ?

सिगरेट सरकारी राजस्व का एक प्रमुख स्रोत है, लेकिन सेहत के लिए हानिकारक भी| इसलिए सरकारी तौर पर  आदेश हुआ कि सभी सिगरेट  के पैकेटों पर ऐसे चित्र बनें कि लोगों को धुम्रपान करने से होने वाले नुकसान का भय हो और लोग भुम्रपान छोड़ें| आदेश मुकम्मल हुआ और ये बात वाजिब भी लगती है, लेकिन बात उतनी सीधी नहीं जितनी अगर धुम्रपान से कैंसर होता है तो बेहतर तो यही रहेगा कि सरकार उस पर पाबन्दी लगाये, बीड़ी सिगरेट बिकवा के लोगों की समझदारी की परीक्षा लेने का क्या अर्थ है?
अगर कोई ये कहता है कि  पाबन्दी से लोगो की निजता मे दखल होगा फिर उसके लिए आंदोलन होगा ये एक कोरी ग़लतफ़हमी है| लती लोग अपनी सेहत भर के लिए तो हिम्मत जुटा नहीं पाते व्यवस्था के लिए क्या खाक लड़ेंगे? जहाँ तक सोशल मीडिया का सवाल है ऐसे कोरी लफ्फाजी लखनऊ के एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय ने शराब के लिए शुरू की जिन्हें बोतालाचार्य भी कहा गया| 
लेकिन आज मद्यपान नहीं धुम्रपान की बात करते हैं, धुम्रपान में तम्बाकू उत्पादक, पान बीडी की दुकान, विक्रता चैनल से लेकर उपभोक्ता तक के हित अनहित का अंतिम सत्य बीमारी है, बीमारी हो या न हो लेकिन शारीरिक अक्षमता तो होनी तय है, यह भी बताया जाता है कि अति धूम्रपान से नपुंसकता की बीमारी के भी खतरे हैं, श्वांस रोग के लक्षण और उनके परिणाम तो सिगरेट के पैकेटों पर बने चित्रों और प्रचार माध्यमों में दिखाए जाते रहे हैं| सिगरेट के पहले हुक्का हमारे  धुम्रपान का राष्ट्रीय प्रतीक था, वह हुक्का आजकल प्रीमियम क्लास उपभोक्ताओं का फैशन है जिसमे तमाम किस्म के नशे और स्वाद का हालिया चलन एक नयी ईजाद है| सूखे में कौन कौन से नशे मिलते हैं इस पर कोई औपचारिक आंकड़ा मौजूद नहीं, लेकिन नए लड़के लड़कियों के लिए यह एक बड़ा आकर्षण बन रहा है| हुक्का बारों की वैधानिकता के लिए सरकारी तौर तरीके से ज्यादा  असरकारी बारों का मादक माहौल होता है जहाँ मंद मंद संगीत से लेकर मादकता के नए आयाम चखने को मिल रहे हैं| वैधानिकता में सरकार कितनी फिसड्डी है ये आकलन करने वालों के लिए नए दौर के लोगों की निजता के मायने भी जान लेना जरुरी है| निजता की गलतफहमियों का ये दौर नशे के कारोबारियों के लिए अवसरों के दरवाजे खोलता है| कारोबारी तौर पर सरकारी इजाजत और रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता हो या न हो लेकिन निजता के मानकों का टोटा इस कदर है कि कई बार शराब पीकर बहकना और रेहड़ी वालों पर रौब दिखाना अमीरी की एक निशानी बन रहा है|  लेकिन शहर के नामी और सफेदपोश माफिया नशे के कारोबार की बदौलत इज्जत और रसूख खरीदने की कवायद में लगे हैं, एक तरफ शराब का कारोबार करके आबादी बिगाड़ने का काम है तो दूसरी तरफ गौशाला, स्कूल, अस्पताल  और धर्मार्थ व्यवस्थाएं| लेकिन सच्चाई तो यही है कि व्यवस्था की इस कॉकटेल में किन्ही साहेबान के दायें हाथ से दक्षिणपंथ और बाएं हाथ से वामपंथ चलता है|  
फ़िलहाल लोगों की निजता जरुरी है कि सेहत ये काम तो सरकार को तय करना है, पहले नशा इतना आम नहीं था, गांजा-भांग-अफीम आदि मंदिरों के जिम्मे था जिनका आयुर्वेद में बहुत प्रयोग होता था, तम्बाकू और हुक्के का चलन कितना पुराना है कभी जाकर पता करिए तो उसकी तस्वीर भी मिल जाएगी| ताड़ी-शराब-कंट्री बड़ी स्थानीय चीज थी, जिसे प्रयोग करने वाले अपने हिस्से की आजादी से इस्तेमाल करते थे, इन सब में कॉर्पोरेट लालच की अंधी दौड़ नहीं थी| जब से अफीम आई तब से सिंडिकेट शुरू हुए, उसी अफीम के पैसे से शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन का पहला प्रयोग हुआ, चीन में अफीम के डेन बनाये जाने लगे हुक्का बार की तरह शुरुआत में मजा आता था, फ्री पिलाने का दौर भी चलता था, बाद में लोग लती हो गए तो राजा को  युद्ध लड़ना पड़ा| इसी अफीम के कारोबार में हिंदुस्तान के साथ चीन के दो युद्ध हुए| इसी कारोबार में अंग्रेज परस्त चीनी माफिया भी पैदा हुआ और हिन्दुस्तानी माफिया भी| आपके शहर में अफीम कोठी है, जाकर पता कर लीजिये वहीँ पर चीन के लिए अफीम सप्लाई का स्टॉक एक्सचेंज था| कुल मिलकर हिंदुस्तान की अफीम से चीन का शिकार हुआ| लेकिन शराब के मामले में ये प्रयोग हिंदुस्तान में ही हुआ, पहले विदेशी शराब यहाँ के रईसों की शान बनी, शुरुआत में आम आदमी के लिए सपने जैसी थी| उन रईसों ने शराब की कमाई से शिक्षा जगत का उद्धार करने की सोची, शराब के रुपये से शिक्षा जगत की नयी व्यवस्था का खाका तैयार हुआ तो उसमे से नए बुद्धिमान निकले, उन्होंने शराब पीने को निजता से दिया| फ़िलहाल की व्यवस्था में शिक्षा व्यवस्था लाभदायक साबित नहीं, लेकिन जरुरी मानी जाती है| इसलिए उसकी बदहाली के बावजूद उसको ढोते जाना सरकारी दायित्व है| अब सरकारें तो कर्जे में चल रही हैं और शैक्षिक संस्थानों की जो हालत है उसमे कोई कर्ज देगा भी तो क्यों? ये तो पता करिए कि देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रदेश की प्रोविंशियल एजुकेशन सर्विसेज के आला अधिकारियों से लेकर शिक्षकों के वेतन का देनदार कौन सूरमा है? खैर ये पता चले तो नशे की सिंडिकेट के पाप धुलने जैसी बात नहीं| शराब कोई नई ईजाद नहीं लेकिन शराब पोषित शिक्षा व्यवस्था जरुर है| जिसमे शराब की हालत भारतीय आयुर्वेद की एक सौतेली बदचलन लड़की जैसी है जिसे पहली दुनिया के आशिकों ने हिंदुस्तान के बाज़ार में उतार दिया, अब सर चढ़ के बोल रही  है, हमारे अपने बच्चे पढ़ाने का जिम्मा उठा रही है| शराब तो पहले से ही हमारी व्यवस्था का हिस्सा थी, तब भी पीने पर पाबन्दी तो नहीं थी, पारिवारिक अनुष्ठानों में सामूहिक तौर पर पीने की व्यवस्था तक मौजूद है| शास्त्रीय सन्दर्भों में देख लीजिये| कौलिक तंत्र में घोषित रूप से निजता और साधना दोनों के लिए मांस, मद्य, मैथुन, मत्स्य और मुद्रा ये घोषित पञ्च मकार हैं, ये तो गृहस्थ की वामाचार साधना के अभिन्न अंग रहे हैं| सिंडिकेट के बाद नया क्या हुआ कि शराब की कमाई से कार्पोरेटी लालच और हमारी नयी शिक्षा प्रणाली का जन्म हो गया| एक समय के बाद इस नकली शिक्षा व्यवस्था से डिमांड और निजता के नए नियम निकले| इस डिमांड और निजता की आड़ में शराब माफिया और चीनी चीनी मिलों का सिंडिकेट खड़ा हुआ| ये एकदम ताजी घटनाएँ हैं, बमुश्किल सत्तर से सौ साल का इतिहास है| वैध और अवैध मिलकर सिस्टम और निजता के आपसी सम्बन्ध तो यही हैं, आप भी अपनी निजता के मानक बताएं तो बात की जाए| 
निजता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए किसी कविवर की अद्वितीय लेखनी का एक कमाल ये भी है|
'गंग भंग दुई बहन हैं, रहत सदा शिव संग। पाप निवारण गंग है, होश निवारण भंग।''
‘गंग भंग दुई बहन हैं, रहत सदा शिव संग। पाप निवारण गंग है, होश निवारण भंग।’’
निजता का सीधा अर्थ पूरे होशो हवास में तय होता है बदहवासी में नहीं, निजता के लिए एक मानक ईमानदारी भी है, जिसमे अपने शरीर, अपने लोगों, घर-परिवार रिश्तेदारों के लिए इमानदारी एक बुनियादी जरुरत है| यही जरुरत देश के लिए भी है लेकिन अखबारी किस्से कहानियों और शिक्षा जगत की देन है कि जुमले और स्पष्टीकरण की नयी परंपरा ईजाद हो गयी| ये जुमलेबाजी कौन सी पहचान बनाएगी ये सवाल समय पर छोड़ते हैं, लेकिन द्रवीभूत मादकता की तो गंध भी अलग पहचान लिए होती है| अब जुमलेबाजी धुम्रपान यानि सूखे या काले का असर है या विजया श्री का ये तो तहकीकात का विषय है| 
आपकी निजता में देश के लिए क्या जरुरी है, सेहत, शिक्षा, निजता या नशा ? 
फ़िलहाल तहकीकात तो अपने वश में नहीं लेकिन हिन्दू परंपरा की एक विलक्षण उपलब्धि आपके हवाले करता हूँ,
कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय
या खाए बौराए जग वा पाए बौराए|
तरक्की और निजता की एक नजीर ये भी देखते चलिए ....



Saturday, December 16, 2017

गुजरात चुनाव और लोकतंत्र की गरिमा गिराती जुमलेबाजी

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक 
भारत का एक पूर्व प्रधानमंत्री वर्तमान प्रधानमंत्री से माफी मांगने को कहे, यह अपने आप में एक खबर है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा क्या कर दिया कि पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने उन्हें अनाप-शनाप और झूठ बोलनेवाला बताकर उन्हें माफी मांगने के लिए कह दिया। ऐसी क्या बात हुई कि मौनी बाबा को मौन तोड़ना पड़ा और एक दहाड़ लगानी पड़ी ? बात सचमुच ऐसी ही हुई है कि जिससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा खटाई में पड़ गई है। गुजरात के चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ने एक जबर्दस्त आरोप जड़ दिया। ऐसा आरोप देशद्रोहियों पर ही लगाया जा सकता है।
उन्होंने यह आरोप लगाया कि कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर के घर पर एक गुप्त बैठक हुई, जिसमें इस बात पर बहस हुई कि गुजरात में मोदी को कैसे हराया जाए। मोदी ने ही बताया कि इस बैठक में पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी, पाकिस्तानी उच्चायुक्त और उनके साथ डाॅ. मनमोहन सिंह भी थे।
यदि रात्रि-भोज की वह बैठक गुप्त थी तो मोदी को कैसे पता चला कि उसमें किन-किन मुद्दों पर बहस हुई ? क्या हमारी गुप्चतर सेवा का कोई आदमी वहां अंदर बैठा हुआ था ? क्या अय्यर की अनुमति के बिना वह वहां जा सकता था ? क्या किसी ऐसी बैठक को गुप्त बैठक कहा जा सकता है, जिसमें तरह—तरह के 10—12 लोग बैठकर मुक्त चर्चा कर रहे हों ? यदि इस बैठक में मोदी को हराने का षड़यंत्र किया गया था और पाकिस्तान के इशारे पर किया गया था तो उन सब लोगों को तत्काल गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया और उन पर देशद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया ?
यह आश्चर्य की बात है कि किसी के घर पर बैठक हो और उसमें पाकिस्तानी उच्चायुक्त शामिल हो और उसका पता हमारे गुप्तचर विभाग को न हो। अगर न हो तो सारा गुप्तचर विभाग बर्खास्त होने के लायक क्यों नहीं है ? यदि गुप्तचर विभाग को इस षडयंत्रकारी बैठक का पहले से पता था तो उसने इसे होने ही क्यों दिया ? उसने सबको पहले ही गिरफ्तार क्यों नहीं कर लिया ?
ये सब कौन थे? इनमें भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व सेनापति, पूर्व विदेश मंत्री, पूर्व विदेश सचिव, पूर्व राजदूत और कई प्रमुख पत्रकार भी थे। नरेंद्र मोदी से कोई पूछे कि क्या ये सब लोग उन्हें हराने के षड़यंत्र में शामिल थे ? क्या ये सब लोग पाकिस्तान के इशारे पर काम करनेवाले लोग हैं ? इनमें से सिर्फ डाॅ. मनमोहन सिंह ने ही नहीं, लगभग सभी ने बताया कि इस बैठक में गुजरात का चुनाव तो कोई मुद्दा ही नहीं था। सारी बातचीत भारत-पाक संबंधों को सुधारने पर केंद्रित थी। जहां तक पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री कसूरी का सवाल है, ज़रा ध्यान कीजिए कि ये वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने मनमोहन सिंह और मुशर्रफ के बीच वह चार-सूत्री समझौता करवाया था, जो आज भी कश्मीर समस्या का हल निकालने में सहायक हो सकता है।
कसूरी और अय्यर व्यक्तिगत मित्र भी हैं, अपने केंब्रिज विवि के दिनों से। कसूरी यहां एक शादी में आए थे और उन्होंने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अनेक लोगों के साथ बैठ कर खुली बहस भी की थी। उनका गुजरात के चुनाव से कोई लेना-देना नहीं था।
गुजरात का चुनाव मोदी का सिरदर्द बन गया है। इस दर्द की दवा वे पाकिस्तान में ढूंढ रहे हैं। यह कितनी शर्म की बात है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावों के निर्णय का श्रेय पाकिस्तान को दिया जा रहा है। पाकिस्तान या किसी भी पड़ौसी देश की यह हैसियत है क्या, कि वह हमारे चुनावों के पलड़े को इधर या उधर झुका सके ? क्या किसी पाकिस्तानी अफसर के कह देने से गुजरात के लोग अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बना देंगे ? एक बार हम यह मान भी लें कि पाकिस्तान चाहे तो वह भारत के मुसलमानों के वोटों को प्रभावित कर सकता है लेकिन आज पाकिस्तान यदि गुजरात के मुसलमान वोटरों को कहे कि आप मोदी को वोट दे दो तो क्या वे मोदी को वोट दे देंगे ?
पाकिस्तान मोदी के आड़े वक्त काम आ जाए तो अच्छी बात है, क्योंकि चुनाव तो युद्ध की तरह होता है। युद्ध में सभी कुछ जायज होता है। लेकिन हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने के लिए मोदी ने पाकिस्तान को गोमाता बनाकर जो उसे दुहने की कोशिश की है, अगर वह सफल भी हो जाती है तो उसे मैं खतरनाक कोशिश ही कहूंगा।
यह कोशिश सामने आई, उसके पहले बड़ा बचकाना आरोप उछाला गया। मोदी ने पूछा कि मणिशंकर अय्यर साढ़े तीन साल पहले जो पाकिस्तान गए थे, क्यों गए थे ? क्या वे वहां सुपारी देने गए थे ? मोदी को मारने की सुपारी ? यदि सचमुच ऐसा घृणित अपराध कोई भारतीय नागरिक करे तो उसे तत्काल सूली पर चढ़ाया जाना चाहिए। साढ़े तीन साल हो गए, यदि मोदी को इस बात की जरा-सी भनक भी लगी थी तो उन्हें चाहिए था कि वे अय्यर को गिरफ्तार करते, उन पर मुकदमा चलाते और यह बात पूरे देश को बताते लेकिन यह बात उन्होंने गुजरात के चुनाव-अभियान के दौरान ही क्यों उछाली ? सिर्फ इसीलिए कि वे वोटों का ध्रुवीकरण करवा सकें। पाकिस्तान-विरोधी भावनाओं का लाभ उठा सकें। इतना गंभीर आरोप लगाकर क्या मोदी ने प्रधानमंत्री पद की गरिमा को बरकरार रखा है ?
अय्यर का यह बयान घोर आपत्तिजनक था कि ‘मोदी नीच क़िस्म का आदमी है’। उसकी सजा अय्यर को मिल गई है। उन्हें कांग्रेस से मुअत्तिल कर दिया गया है और उन्होंने माफी मांग ली है लेकिन इस बात पर बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया है कि उन्होंने मोदी के लिए जो अपशब्द कहे हैं, उनके लिए माफी नहीं मांगी है बल्कि नीच शब्द को नीची जाति से जोड़े जाने के लिए माफी मांगी है।
उधर मोदी ने अय्यर के बारे में जो कुछ कहा है और देश के अन्य जिम्मेदार लोगों के बारे में जैसा बयान दिया है, क्या उससे यह सिद्ध होता है कि वे ऊंचे किस्म के इंसान हैं ? वैसे वे जैसे भी इंसान हों, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं। भारत-जैसे महान और विशाल लोकतंत्र के शीर्ष पुरुष से यही आशा की जाती है कि वह मन, वचन, कर्म से किसी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करेगा। अय्यर ने वैसे शब्दों का प्रयोग करके अनचाहे ही मोदी की मदद कर दी है। यहां हम यह भी कह दें कि राहुल गांधी के संयत भाषणों और बयानों ने देश का ध्यान खींचा है। यह भी उचित नहीं कि विदेश जाकर हम हमारी सरकार या प्रधानमंत्री की खुली आलोचना करें लेकिन प्रधानमंत्रियों को भी यह ध्यान रखना होगा कि विदेशों में जब वे सार्वजनिक सभाएं करते हैं तो वहां जाकर विपक्ष की कटु भर्त्सना न करें।
गुजरात के चुनाव ने भारतीय राजनीति में संवाद के स्तर को काफी नीचे गिरा दिया है। इसका कारण यह भी है कि यह सिर्फ एक प्रांत का चुनाव नहीं है बल्कि यह अगले संसदीय चुनाव का पूर्व रुप है। भाजपा और कांग्रेस के भविष्य को यह चुनाव ही तय करेगा। एक पार्टी ने हार के डर से और दूसरी पार्टी ने जीत के उन्माद में बहकर लोकतंत्र की मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है। संवैधानिक पदों का निष्कलंक निर्वाह करनेवाले कई लोगों के आचरण पर आक्षेप तो लगाए ही गए हैं, चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर भी कीचड़ उछालने में कोई कमी नहीं रखी गई है। इस चुनाव में कोई भी जीते या हारे, देश के नागरिक आशा करेंगे कि यह कटुता गुजरात के चुनाव के साथ-साथ समाप्त हो जाएगी।

नोट: डॉ वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं एवं अनेक अख़बारों के संपादक रहः चुके हैं ।

Thursday, December 7, 2017

गाय की बदहाली का असली गुनाहगार कौन-1


कानपुर नगर के सरकारी महकमे कूड़े में भी फिसड्डी हैं और उसी के चलते गाय कूड़े के ढेर पर नजर आती है| कानपुर में पांच सौ से ज्यादा दुग्धशालाएँ यानि चट्टे है| उसकी बदहाली में भी गाय कूड़ा घर में दिखाई देती है| कानून बना था कि शहर के भीतर मौजूद दुग्धशालाओं की व्यवस्था नगर निगम करेगा| ूड़े की कवायद में उसने ये काम बंद कर दिया| आज गाय कूड़ा ही नहीं खाती बल्कि जो गोबर करती है वह शहर की नालियों में बहकर गंगा में भी गिरता है, कानपुर की गंगा के गुनाहगारों के तौर पर टेनरियों को दोषी कहा जा रहा है| मेरा दावा है कि आप एक बार जल निगम, जल संस्थान, केडीए किसी भी विभाग को देख लीजिये उनके पास भी ब्लेम गेम भर ही है, ठोस जवाब नहीं| केन्द्रीय पोल्लुशन कण्ट्रोल बोर्ड और एनजीटी किसी से भी या पूछने की हालत में नहीं कि वे दुग्धशालाओं के नियमितीकरण में क्यों विफल साबित हो रहे हैं| न ही किसी को इस बात की परवाह है कि गाय हो या आदमी उसकी भूख मिटाने के लिए अधिकार संपन्न नौकरशाह विवेकशून्य क्यों साबित हो रहे हैं? क्या सच में उन्हें जनता के साथ छल करने में मजा आ रहा है? क्या सच में वे गायों की बदहाली से, कुत्तों की बीमारी से, गिद्ध और गौरय्या के गायब होने से आहत नहीं| अगर ऐसा है तो गाय की जो अनदेखी सरकारी महकमों में है उसको भी आप लोग भ्रष्टाचार क्यों नहीं कहते| गाय की बदहाली से आहत अतुल तिवारी रवि शुक्ला अगर अवाम तक जा सकते हैं तो पशु धन अधिकारी और पशु चिकित्सा अधिकारी क्यों चूड़ियाँ पहने बैठे हैं? और अगर वे चूडिया पहने बैठे हैं तो हमारे नेता लोग कुछ करते क्यों नहीं? और अगर नेता और पार्टी वाले कुछ करने में नाकाम हैं तो वे गाय के साथ महज फोटो खिंचा के क्यों मुख्यंमंत्री-प्रधानमंत्री बने बैठे हैं? कथनी करनी का यह मौलिक फर्क क्या यह सरकारों के लिए बेहतर छवि बनाएगा? मुझे नहीं पता कि मुस्लिम के गाय की क्या हालत आपने देखी है लेकिन हमारे शहर में ही नहीं इस मुल्क के निज़ाम ने फरमान जारी करके गाय के क़त्ल को रोका है, इतिहास गवाह है| आज अगर नेता और निज़ाम को बदहाली के लिए जिम्मेदार नहीं मानेंगे तो क्या कंपनी और सरकार को क्लीन चिट देकर आप गाय बचा लेंगे? हिन्दू-मुसलमान वाली  आधी अधूरी तस्वीर से गाय भी आधी अधूरी ही बचेगी? बचाते रहिये|
निजी तौर पर मै ऐसी ग़लतफ़हमी से बचता हूँ जिसमे हिन्दू की गाय, मुसलमान की गाय, सिख की गाय या इसाई की गाय की बात हो... इस देश में गायों के लिए बेरहमी माफ़ नहीं की जा सकती आप जिस मुगालते में गाय के मामले में सिर्फ और मुसलमान गुनाहगार की नजर से देखते हैं वह बाकी धर्मों और देश को नजर अंदाज करने का एक बड़ा उदहारण कहा जा सकता है| इस अनदेखी का हश्र है कि अमूमन शहरों में ही नहीं गावों में भी कूड़े पर मुंह मारती गाय नजर आ ही जाती है| गाय की आदमी के लिए क्या अहमियत है यह सेल्फी वाले फोटो या किताबी बातों में खोजेंगे तो जवाब मिलना मुश्किल है| लेकिन गाय हमारे जीवन को व्यवस्थित कैसे कर सकती है वह देखना चाहते हैं तो आपको गाय पालनी पड़ेगी और उसकी फ़िक्र करनी पड़ेगी| जाड़ा गरमी बरसात में सुबह उठ कर चारा देना पड़ेगा| अपने तरह न सही लेकिन एक छत भी देनी पड़ेगी| लेकिन इतना जरुर है धर्मपत्नी जी की तरह वो भी आपका जीवन व्यवस्थित करने में मदद ही नहीं करेगी आपको समय का पाबंद भी बना देगी| समय का सदुपयोग कर सके तो गाय एक कल्पवृक्ष ही साबित होगी| एक घर को आत्मनिर्भर करने में सिर्फ 2 साल की कारगर कवायद करने की देर है, गाय हर घर को और पुरे देश को सक्षम और सम्पन्न बना सकती है| आज यदि कोई गाय की फिक्र नहीं कर पा रहा तो यह और भी दयनीय परिस्थिति है| इस दयनीय परिस्थिति में योगी जी ने खुद गाय पालने की नजीर बनाई उसके बावजूद गायों की दीगर बदहाली हमारे देश का ताजा सच है| जाहिर है कि यह सच्चाई समाज को बेचैन कर रही है| आज राहुल जनेऊ पहनते हैं और पूरे देश में ब्राह्मण की बेजा बहस होने लगती है| यह नेता का मीडिया और देश पर असर है| अगर राहुल किसी गाय को पाल बैठते हैं तो भाजपा वाले क्या मुंह दिखायेंगे? मुसलमान को गाय के लिए जितना बड़ा गुनाहगार दिखाते हैं वह अधूरा सच है, उस सच का एक दूसरा हिस्सा बीफ निर्यातकों की फेहरिस्त भी है, उस पर बहस नहीं, क्या वजह है? फेहरिस्त में कौन-कौन शुमार हैं वह किसी से छुपा नहीं| प्लास्टिक देश की जरुरत घोषित कर दी गयी और शहरों में कूड़े के अम्बार खड़े हो गए| उसी कूड़े के अम्बार पर जब गाय नजर आती है तो गाय और मुसलमान करते हैं, जबकि गाय सबकी है और मैंने हर तबके को गाय पालते देखा है| कूड़ा फैलाना अपराध माना जाए ये कहना है मेधा पाटेकर के समर्थकों का| शायद ही कोई हो जो इसे मना कर सके, लेकिन यह कानून बन गया तो अवाम के शोषण का औजार ही साबित होगा| जब गाय की बात करनी हो तो आपको आधी अधूरी सच्चाई के बजाये पूरी तस्वीर साफ़ साफ देखने की जरुरत है|
देवेन्द्र चौधरी मानते हैं कि गाय के विषय में जो प्रोजेक्ट लाभकारी बताए गए हैं वे विचार से तो वे लाभकारी नही है| गहराई में जाकर पता चला कि जमीन सरकार से फ्री लीज पर, भूसा चारे पर जिलाधीश से सब्सिडी इसके अतिरिक्त कमीशन पर समाज के सभ्रान्त वर्ग से चन्दा उगाही फिर उत्पादन को मंहगी दर पर बिक्री यह काम समान्य व्यक्ति नही कर सकता। जाहिर है कि गाय की फिक्र कम और नेतागिरी ज्यादा हो रही है|

गौरक्षा आन्दोलन के अगुवा सुरेन्द्र सिंह बिष्ट कहते हैं कि देशी गोवंश की नस्लों को सरकार ने दो भागों में बांटा है - दुधारू और अन्य कार्य उपयोगी।
पर देश में हुए 5 सफल प्रयोगों ने सिद्ध कर दिया है कि बाकी नस्लों को भी ज्ञान- विज्ञान के आधार पर फिर से दुधारू बनाया जा सकता है। अब तक जिन 5 नस्लों पर सफल काम हो चुका है वे हैं -
गंगातीरी, लाल कंधारी, कांकरेज, गंगायन और खिलार। इससे विश्वास हो गया है कि अन्य नस्लों को भी दुधारू बनाया जा सकता है। जो दुधारू हैं, उनके अनेक उदाहरण पहले से मौजूद हैं। जैसे गीर गाय की अहमदाबाद स्थित वंशी गोशाला। उन अनुभवों के आधार पर कुछ समर्थ लोगों को आगे आना है, जो लाभदायी गोपालन व्यवसाय के मॉडल्स स्थापित कर समाज का प्रेरित कर सकें
|
सुरेन्द्र सिंह बिष्ट गोरक्षा आन्दोलन के अगुवा और पूर्व भाजपा अध्यक्ष के.एन. गोविन्दाचार्य निकटम सहयोगी भी हैं| उनका निष्कर्ष है कि... 
गोरक्षा के लिए गोशाला यह आपत्धर्म है,
युगधर्म है गोपालन व्यवसाय !
लाभदायी गोपालन व्यवसाय के मॉडल्स खड़े हों !!
लेकिन शायद वरिष्ठ हिंदूवादी सुरेन्द्र बिष्ट परंपरा और इतिहास बोध में डगमगा जाते हैं, उनके मुताबिक हमारे यहां वैश्य के प्रधान कर्म बताएं हैं - 1) कृषि 2) पशुपालन 3) व्यापार और 4) कुशीद ( ब्याज) उनके लिए लाभ को परिभाषित करना और व्यवहार में या व्यवस्था में लागू कर पाना मुश्किल मालूम होता है|
खैर व्यवस्था रोजनामचे में चलती है, गाय को भी रोज भूख लगती है| इसलिए पहले चारा फिर कारोबार की नीति रखनी होगी| कारोबार के नाम पर देखा जाए तो गोबर गैस प्लांट सबसे पहले हिंदुस्तान ने ईजाद किया, पूरी दुनिया ने देखा, लेकिन क्या गाय चारा खाए बिना गोबर करेगी? जैसे इन्सान लोग भोजन करते हैं वैसे ही गाय भी चारा रोज खाती है| लेकिन गोपालक लालू चारा खा गए पूरे देश ने देखा, जा के पूछिए ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय हैं, वैश्य हैं या शूद्र| गाय की पूरी की पूरी नस्ल बीफ के नाम पर निर्यात होती है वो भी देश ने देखा, जा के पूछिए की बीफ का निर्यात क्या सच में वणिक कर्मों में आता है? गोबर गैस पर खूब गुरुज्ञान बंट रहा हैं, नौकरशाही के गुरु भी गावों की जीडीपी बढ़ाने पर अमादा हैं| कानपुर गौशाला सोसाइटी ने अट्ठारह सौ पचासी में गाय पालने की व्यवस्था शुरू की| आज वहां पॉवर प्लांट, गैस प्लांट, गौ-आयुर्वेद से लेकर सौन्दर्य प्रसाधन के गौ उत्पाद सब मौजूद हैं, जाइए बनाइये मुनाफे, वो इंतजार कर रहे हैं कि कोई आये और करे चमत्कार| तब भी निकम्मे गाय पाल के आवारा छोड़ देते थे, हुकूमत पकड़ के कांजी हौस में बंद कर देती थी, कोई छुड़ाने आता था तो उससे जुरमाना वसूल के गाय अपने स्वामी के हवाले की जाती थी| अंग्रेज बहादुर पकड़ के कटवा देते थे, उसी पकड़ से उन्होंने चमड़े के कारखाने खड़े करवा दिए| ये कलंक आया मुसलमान के नाम, ज्यादातर पारम्परिक व्यवसायी थे, उन पारंपरिक व्यवसायियों का कलंक धोने में राम जी की गंगा भी मैली हो गयी, ये कानपुर शहर का विश्वविख्यात नजारा है|
सच तो यही है कि गाय को दुनिया भर में व्यवस्था में जो दुत्कार आजकल मिल रही है वह अंग्रेजी हुकूमत की देन है| जब से अंग्रेजी हुकूमत ने कत्लखाने खोले तब से गाय में हिन्दू मुसलमान शुरू हुआ, इसकी दीगर गवाही है अंग्रेजी ब्राण्ड के चमड़े के जूते जो आज भी हमारे लोकजीवन का हिस्सा हैं| गौहत्या के राजनीतिक विरोध का क्या स्तर रहा उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1857 में गाय और सूअर की चर्बी के कारतूसों की खिलाफत में विद्रोह हुआ| विद्रोहियों का दमन करने के लिए उन्हें गौमांस खिलाया गया और सूअर की खाल में लपेट के फांसी पर लटकाया गया| इतिहास के ये जख्म उन्हीं ग्लोबल बनियों की ही देन हैं, जिनका कारोबार बदस्तूर जारी है, बस तरीका बदल गया है| नब्बे के दशक में यूरोप में मैड काऊ डिजीज हुई, बड़े पैमाने पर| वजह थी ग्लोबल बनियों का लालच जिसमे सेक्युलर वैज्ञानिकों के ख्याली पुलाव भी शामिल थे| पश्चिम में गौमांस का चलन है, उन्होंने गाय से दूध लेने के अलावा उसको लाभदायक बनाने की कवायद जारी रखी, जैसे आप जूझ रहे हैं शायद उसी तरह| वैज्ञानिकों ने गौमांस के बाद बचे व्यर्थ से चारा बनाना शुरू किया| लाभ मात्र के लिए वह चारा जानवरों को दिया जाने लगा| जब उस चारे को गायों को खिलाया गया तो तत्काल में वह फायदे का कारोबार माना गया लेकिन दीर्घकालिक तौर पर उससे खतरनाक परिणाम निकले| गौमांस वाला चारा खिलाने गायों में खास किस्म की बीमारी पैदा हुई| वह बीमारी लाइलाज थी और करोड़ों गायों को मार कर उस बीमारी से निजात मिल सकी| गायों को तो मार दिया गया लेकिन उसके बाद दूध की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर पाना संभव नहीं था| तब हिंदुस्तान से सांडों का वीर्य आयत करके नयी नस्ल तैयार करने की कवायद शुरू हुई| हिन्दुस्तानी नस्ल के सांडों को दक्षिण भारत उत्तर भारत और लगभग सारे देश से एकत्र करके निर्यात करने का कारोबार खूब फला-फूला| आज की सरकारों ने इस कारोबार को अमली जामा पहनाने के लिए उसे कानून की शक्ल दे दी है| इसी के साथ साथ विदेशी नस्लों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसके दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे ये तो वक़्त बताएगा| फिलहाल गायों के लाभदायक व्यापार के भूत के साथ साथ उन्ही कंपनियों ने हिंदुस्तान की सरकारों को गुरु ज्ञान देना शुरू किया है, उन प्रोजेक्टों को देश की उर्जा आवश्यकताओं के साथ जोड़कर देखा जा रहा है| हमारी उर्जा आवश्यकताओं के लिए जो बाँध बने हैं उनसे नदियों की बदहाली दीगर है| नदियों पर नीतिगत घालमेल हमारी नैसर्गिक संपत्तियों को बर्बाद करने जैसा घृणित कृत्य है, लेकिन ये सब लाभ के लिए चल रहा है| बड़े-बड़े वकील और कंसलटेंट ईआईए-एसआईए और डीपीआर की कवायद में मोटी तनख्वाह लेकर देश बर्बाद करने का विधान बना रहे हैं| अब कंपनियों ने अपने मानवतावादी संस्थानों और हमारे नौकरशाहों के कंधे पर बन्दूक रख कर नया खेल रचा है| इस खेल में उनका निवेश किस तरह का है इसकी जानकारी करनी हो तो किसी खाद बीज की दुकान या नर्सरी म जाकर देखिये| चीनी कंपनियों की खाद सवा सौ रुपये किलो बिक रही है| हमारा गोबर, हमारी गाय हमारी जमीन और लाभ किसका... कंपनी का| वही कंपनियां उर्जा क्षेत्रों में अपने प्रोजेक्ट लगा रही हैं, जिसकी बिजली खरीद के हमारा सामाजिक विकास होगा| देश के लोग परंपरा की बहस में, हिन्दू-मुसलमान में सर खपा रहे हैं और कंपनी वाले गाय-गोरु-जमीन सब कब्जाए जा रहे हैं|
डीएफआईडी में डेवलपमेंट कंसलटेंट रहे डॉ. ओंकार मित्तल अपने अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि  
सन 2001 का समय था जब यूनाइटेड किंगडम में हज़ारों लाखों गो वंश को ज़िंदा जला दिया गया| शायद खुरपका की महामारी को फैलने से बचाने के नाम पर। मैं उस वर्ष लंदन में ही था। मुझे विश्वास नहीं हुआ कि मनुष्य जाति का एक हिस्सा इतना अंधा और क्रूर हो सकता है। मेने देखा - जैसा आपने संकेत किया है- गाय को ये हड्डियों का चूरा खिलाते हैं चारे के रूप में। 60 के दशक में ही - फ़्रान्स के लेखक चार्ल्ज़ बथलम की यह थीसस आ गयी थी कि भारत में गौ वंश मात्रा बहुत ज़्यादा है और इसको कम किया जाना चाहिए। कोसी बाँध बनने से पूर्व लाखों गाय कोसी के मैदानों में मौजूद थी जो जल भराव के कारण नष्ट हो गयीं। गौ वंश की रक्षा के इन व्यापक मुद्दों पर हम लोगों की तरफ़ से एक जाति और राष्ट्र के तौर पर कभी समुचित विचार नहीं हुआ।