Friday, January 5, 2018

भीमा कोरेगांव, दलित, पेशवा, अंग्रेज और सिपाही बहादुर

.... ये 1857 का वाकया है| उसके पहले मुग़ल हुकूमत में एक जुमला चलता था खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का, हुक़म सिपाही बहादुर का| जब बादशाह हुजूर ने कारोबारी बिचौलियों को मालगुजारी सौंपी तो जुमले का तर्जुमा बदला... खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का, हुक्म कंपनी बहादुर का| ये जुमला शाही फरमान जैसा लागू करने के लिए बिचौलिए व्यापारी ने सामंत गढ़े| सामंतों ने काश्तकारों के खून पसीने की हिस्सेदारी वसूल की| किसको परवाह है कि ये वसूली किस कीमत पर कंपनी को मिली? कंपनी ने कमाया और नए विद्वान गढ़ दिए, नए फरमान गढ़ दिए, लेकिन इनकी चल न सकी| वो विद्वान और फरमान तब भी जमीन से कोसों दूर थे, आज भी कोसों दूर शहरों में ही रहते हैं| अवाम के लिए ये सब उतना नया था जितना कि सिपाही बहादुर के लिए| सिपाही बहादुर देश की सीमा की रखवाली करके देश के अन्दर मौजूद अवाम को राजनीति खेलने का माहौल देते हैं|बहादुर सिपाही अवाम के बीच से ही होते रहे हैं, तब भी थे और अब भी हैं| अंग्रेज हुकूमत के चलते अपने ही लोगों की बदहाली का गुनाहगार होना कितना गवारा हुआ होगा ये फैसला आप लोगों पर छोड़ता हूँ| लेकिन जब सिपाही बहादुर से अवाम की पीड़ा नहीं देखी गयी तो सिपाही बहादुर ने फिर से ऐलान कर दिया कि खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का, हुक्म सिपाही बहादुर का| इस ऐलान के साथ बहादुर सिपाही अपनी अवाम के लिए लड़े, मारे गए|

मै कानपुर में रहता हूँ, कानपुर पूरी दुनिया में पहला शहर था जिसने बसने और विस्तृत होने के बाद उस कंपनी को सीधी लड़ाई में हराया जिसके राज में सूरज नहीं डूबता था| लेकिन जब कंपनी ने इस शहर को वापस जीता तो हिन्दू, मुसलमान, सिख-इसाई, दलित-अवर्ण-सवर्ण सभी से एक-एक करके हिसाब किया| फूलबाग में कई एक बरगद के पेड़ है, उनमे से एक पेड़ को बूढ़ा बरगद कहा जाता है, बताते हैं कि उस पेड़ पर एक सौ तैंतीस सैनिकों को लटका के फांसी दी गई थी| समाज और व्यवस्था के खयाली कचरे में डर की अपनी अहमियत है| खैर, जब खुलेआम लटकाया गया था, तब लटकाया गया था, जब से मैंने देखा सुना तब उसमे चमगादड़ लटका करते थे, बाद में जब उस पेड़ की मियाद पूरी होने लगी तो उस पेड़ की इज्जत करने वाले सुधी महापुरुषों ने उसे टिकाने के लिए सहारे भी खड़े किये| अब भी कुछ ऐसा ही होगा, बहुत दिनों से देखने जा नहीं पाए हैं| जानते हैं राजनीति के समझदारों ने क्या किया, श्रीमान राहुल गाँधी को बुलाकर उसी के आस पास राहुल गाँधी से एक दूसरा पौधा लगवाया बरगद का| अब इंसानी संवेदनाओं में हुकूमत की परवरिश करते हैं तो और बात है लेकिन क्या इंसानियत की परवरिश, परस्तिश तो ऐसे होती सरकार? आज तो इसी बात की दौड़ लगी है, कि अंग्रेज बहादुर का ज्यादा करीबी कौन? गौरतलब है कि किसानों की मौतों का जो सिलसिला अंग्रेज बहादुर के राज में शुरू हुआ था, आज वो थोक के भाव में नजर आता है, इसके बावजूद मालूम होता है कि नेता-नौकरशाह और पढ़े-लिखे-समझदारों ने मिलकर हमारी जमींने ब्रिटिश कंपनियों को देने की नीयत बना ली है| इस बात के गवाह वो तमाम आंकड़े हैं जिनकी बदौलत नजर आता है कि किसान की जमीन लेकर कंपनी बहादुर या कंपनी बहादुर के नजदीक वालों को बांटी जा रही है|

जमीन मेहनत और बलिदान मांगती है, मेहनत के पसीने से फसल लहलहाती है, शहरों के साहेब बहादुर उसी फसल के कारोबार से फलते फूलते हैं, उनके लिए जरुरी है कि विकास के नाम पर किसान की आबरू न बेचें| देश की सीमा की बहादुर सिपाही के बलिदान से सलामत है, उस बलिदान से देश का रंग सलामत रहता है, बलिदान से देश की रौनक बनती है| सैनिक की शहादत पर कोई बेतुकी बयानबाजी करना बलिदान देश हित में तो नहीं| देश के लिए शहीद हुए लोग दलित हो, अवर्ण हो या सवर्ण, हिन्दू हो या मुसलमान किसी की मेहनत, बहादुरी और बलिदान को कोरी बयानबाजी से कमतर करना देश में बहादुरों की बेइज्जती होगी| ऐसी बयानबाजी से देश चलाने की हिमाकत करने वालों के लिए एक सलाह यही है कि पहले फर्क पैदा करके दिखाइए, उसी फर्क बना फलसफा नजीर होगा| अपनी जान पर खेल कर हमारे देश के सिपाही और अपनी मेहनत के जोर पर खिलाडी भी यही करते हैं|

देश में राजनीतिक मसखारेबजी के लिए आज मीडिया वालों के पास तमाम विकल्प हैं, मसलन पेशवा की खिलाफत, अंग्रेज बहादुर की हिमाकत, चीन की खिलाफत, ब्रिटिश हुकूमत की निजामत, पाकिस्तान की खिलाफत, अमेरिकी हिमाकत इत्यादि-इत्यादि दलित, मुसलमान, हिन्दू सब मिल के इतिहास के सिपाही बहादुर को जिन्दा करने में लगे हैं, जितनी जंग -उतने बहादुर वाले लोग भीमा कोरेगांव से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध तक आ-जा रहे हैं, लेकिन महज इतिहास के बयानों में! हो सकता है कि ये महज ऐतिहासिक लफ्फाजी या जुमलेबाजी भर साबित हो, वो भी कुछ दिन के लिए! ये भी हो सकता है कि बयानवीर लोग हर जंग की आंकड़ेबाजी में नाम-गाम भी जान जाएँ, शायद सिपाही के घर-परिवार-रिश्तेदार तक भी बात पहुंचे| लेकिन ये सब बातें असल की फसल से कोसों दूर हैं| परन्तु ये चिंताजनक है और अवाम की बेचैनी बढ़ाने और नफरत फ़ैलाने का वायस साबित हो रही हैं| देश की अवाम का आपस में लड़ना तो किसी देश की आत्महत्या जैसा ही नजारा है| तीन सालों में देश के 425 सेनानायकों ने आत्म हत्या की, इतने ही समय में 34847 सेनानायकों ने समय से पहले नौकरी छोड़ी| लेकिन नकली बातों और फसादों में ये आंकड़े किसी के माथे पर बल नहीं पैदा करते| असल बात तो ये है कि दलित-अदलित फसाद के जितने भी पक्ष हैं उनको देश, देश की सेना, सेना की बहादुरी, बहादुरी की शहादत, शहादत का सम्मान की फिक्र किसी को भी नहीं| देश भावनात्मक एकता से बनता है, अगर भावनाओं में हमदर्दी नहीं तो फिर ये सब फसाद भर है| इसलिए सच तो यही है कि ये सब बातें नकली हैं, इन बातों के स्वांग भी नकली हैं, जिरह भी नकली है और फसाद भी, ये नकली बहस और फसाद हमारे नेताओं के मानसिक स्वास्थ्य का हाल जरुर बताती है|, लेकिन बहादुर सिपाही, जंग और हुकूमत महज कोरी बयानबाजी भर नहीं| जानकारी में ही बचाव है, मान के नेता-नौकरशाह और अवाम को ईमानदारी और हिम्मत करनी होगी! तभी देश के लिए जान देने वालों का सम्मान हो सकेगा|

इसलिए अपने देश की बात के लिए...

कुछ तो पर्देदारी रख, राख तले चिंगारी रख,
माना अमन जरुरी है, जंग की भी तैयारी रख|
 

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