Friday, November 24, 2017

पत्रकारिता और विश्वगुरु भारत के तमगे की नीलामी!

अमूमन बड़े से बड़े दैनिक की फिजिकल पहुँच दो सौ मीटर की होती है, इतने बड़े सर्किल में लेखन रिपोर्टिंग से लेकर वितरण और सप्लाई चैन के अपने अपने व्यवधान हैं| इस मीडिया तंत्र में प्रताप का विलुप्त हो जाना, क्रन्तिकारी पत्रकारिता के बुझने जैसा साबित हुआ| भगत सिंह, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, सनेही, प्रताप नारायण मिश्र जैसे क्रांतिकारी "प्रताप" के नगीने रहे, जिनकी बदौलत क्रांतिकारी विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ जैसा जानदार अखबार निकाल कर क्रान्ति को प्राण फूंक दिए थे। इसमें अहम् पक्ष था देश की अवाम की भावना को एक मुकाम देने का, सूत्रबद्ध करने का, नेटवर्किंग और रिपोर्टिंग सोर्सेज का|

देश की हालत बयान करने का उदहारण देखिये, तेईस मार्च को लाहौर में भगत सिंह भगत सिंह की फांसी होती है, कानपुर में खबर आती है, उसी दौरान शहर का माहौल भडकता है, शांति के प्रयासों में पच्चीस मार्च को विद्यार्थीजी शहीद होते हैं| लाहौर से कानपुर तक की सूत्रबद्धता का बुनियादी सबक आज की पत्रकारिता से गायब है| ये फर्स्ट हैण्ड नेटवर्किंग और पत्रकारिता का मौलिक नजरिया गायब होने के चलते आज पूरा देश विदेशी एजेंसियों की खबरों से पोषित-प्रेरित मीडिया से चल रहा है| हिन्दुस्थान समाचार, पीटीआई, यूएनआई सरीखी सरकारी सहायता वाली मीडिया एजेंसियां खुद में उतनी सक्षम नहीं| देश की मीडिया की बौद्धिक बदहाली दीगर है| सब मीडिया महाराज लोग कॉर्पोरेट परस्ती का अपना-अपना पैमाना रच रहे हैं, अपना-अपना बहाना रच रहे हैं| कानून की बजाए सरकारी परस्तिश बौद्धिक बेसुरेपन का दूसरा नाम हो चला है| यही बौद्धिक बेसुरापन हमारे शहर की पत्रकारिता में वायरस की तरह फ़ैल गया मालूम होता है| इस बौद्धिक बेसुरेपन के नतीजे प्रेस क्लब और अख़बारों के होर्डिंगस से दिखाई देते हैं| देश भर के प्रेस क्लब और पत्रकारों के संगठन इसी बौद्धिक बेसुरेपन के नमूने मात्र नजर आते हैं| यही बेसुरापन सोशल मीडिया पर भी चढ़ के बोल रहा है| इसे रिपोर्टिंग में ईमानदारी की बजाए चर्चित हस्तियों के साथ सेल्फीनुमा प्रचारों में भी देखा जा सकता है| पत्रकारों के लिए शोषण और अत्याचार को भी कोई ठीक से कह सकने की हालत में नहीं| अदालतों के मामले और पूरी व्यवस्था को गंभीरता से लेने की बजाए हमारे पत्रकार सिर्फ सनसनी बनाकर कर्त्तव्य निभा रहे हैं| क्या यही हमारी पत्रकारिता का प्रोफेशनलिज्म है| तिस पर भी वही पत्रकार राजनीति वालों पर जुमलेबाजी के आरोप लगाते है! संभव है कि जुमले वाले को बयान और वक्तव्य में फर्क नहीं पता हो! लेकिन जरा बताइए तो कि लिखने वाले को अपने लिखे का कितना होश है? लिखने वाले अपने लेखे की जिम्मेदारी लेने के लिए कितना तैयार हैं? अगर आप घटना के साक्षी हैं और रिपोर्टिंग कर रहे हैं तो एक पार्टी तो आप होते ही हैं, अब अगर पत्रकारिता या फोटोग्राफी में इतना वजन भी न होगा तो पत्रकारिता में #विश्वगुरु_भारत वाले तमगे की नीलामी तय मानिये!

Monday, November 20, 2017

भ्रष्टाचार की शिकार गंगा के लिए अपील

भ्रष्टाचार की शिकार गंगा के लिए अपील
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शहर के नगर निकाय चुनावों की सरगर्मियां सर्दियों का स्वागत कर रही हैं. मंच, माला, माइक, प्रचार, चर्चा, पर्चा, खर्चा का दौर है|  लोकतंत्र के प्रत्याशियों के दम खम के गुणा गणित विवेचन में सभी सराबोर हैं. लेकिन सच तो यही है कि जो लड़ेंगे वही जीतेंगे भी| मैं सभी प्रत्याशियों के लडने के जज्बे को सलाम करता हूं|  लडने का यही जज्बा हमारे शहर की बुनियादी है| बेहतरी के लिए संघर्ष की यही चाहत व्यवस्था से लेकर देश की सीमाओं तक की हिफाजत का मूलमंत्र है| सभी पार्षद प्रत्याशियों को लोकतंत्र के चुनाव पर्व में भागीदारी निभाने के लिए हार्दिक शुभकामनायें| सरकार और सदन में चाहे कोई काबिज हो लेकिन आप लोगों के संघर्ष ही जनता की ताकत हैं| चुनावों के बाद भी बेहतरी के लिए किये गये संघर्ष से हमारे शहर की जनता जीतेगी| सभी पार्षद प्रत्याशियों के सम्मान में मेरी अपील है कि सभी लोग मतदान करके लोकतंत्र के पर्व में सहयोग करें| एक स्वस्थ लोकतंत्र हम सब की भागीदारी मांगता है| हमारी सामाजिक फोरम गंगा एलायंस इसी मतदान की भागीदारी को बढाकर बेहतरी हासिल करने की कामना करती हैं| हम उम्मीद करते हैं कि लोकतंत्र में अवाम की साझेदारी से नौकरशाही की जिम्मेदारी भी मुकम्मल हो सकेगी| जब शहर की जनता व्यवस्था में सीधी साझीदार होगी तभी भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी| तभी गंगा की बदहाली दूर हो पायेगी| 

लोकतंत्र के साझीदार बनें
मतदान करें

Wednesday, November 15, 2017

जुटे शहर के छात्र-शिक्षक और बुद्धिजीवी, फाइनल जस्टिस 365 के लिए कमर कसी


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कानपुर| पद्म टावर स्टॉक एक्सचेंज में हिंदुस्तान हिंदी दैनिक के तत्वावधान में साल भर के भीतर न्याय मिलने के लिए मंथन बैठक का आयोजन किया गया| बैठक में तमाम विद्यालयों के प्रधानाचार्यों ने भाग लिया| बैठक में चर्चा के तीन सत्र आयोजित किये गए| प्रथम सत्र में कार्यक्रम के संचालक और फाइनल जस्टिस @365 के संयोजक गौरव बाजपेई ने न्याय पालिका के सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत विगत एक वर्ष में किये गए कार्यों और विद्यालयों के सौजन्य से किये गए आयोजनों का ब्यौरा प्रस्तुत किया| अपनी प्रस्तुति में गौरव बाजपेई ने बलात्कारों को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की और सभा में उपस्थित गणमान्य नागरिकों से इस विषय में एकजुट होने की अपील की| उन्होंने यह भी बताया कि विगत वर्ष के तमाम कार्यक्रमों के अंतर्गत साल भर के भीतर न्याय मिलने की गुहार में उन्होंने तमाम विद्यालयों के छात्र-छात्राओं और अध्यापकों के साथ मिलकर एक लाख पत्रों को प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा| इस पत्राचार के परिणामस्वरूप न्याय व्यवस्था की विसंगतियों की गंभीर बातें सामने आयीं| गौरव बाजपेई ने प्रधानमंत्री के सचिव नृपेन्द्र मिश्र के हवाले से बताया कि इस समय सरकार और न्यायपालिका की खासी अनबन है| न्यायपालिका में सुधारों के लिए खुद न्यायपालिका ही तैयार नहीं है| महिलाओं के खिलाफ अत्याचार में न्याय पालिका की सुस्ती भी जिम्मेदार है| न्यायपालिका की यह हालत बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के लिए भी संवेदनशील नजर नहीं आती है| छोटी बच्चियोंमहिलाओं वृद्धा आदि के बलात्कारों के मामले में 365 दिनों के भीतर न्याय मिलना चाहिए| जघन्यतम मामलों में सजाएं मौत के प्रावधान पर सभी ने सर्वसहमति जताई। पीड़ित महिलाओं को लेकर एकजुट हुए लोगों ने संगठित होकर न्यायपालिका में सुधार के लिए प्रयास जारी रखने का संकल्प लिया| परिचय सत्र के संबोधन के उपरांत महिला प्रधानाचार्यों का एक पैनल डिस्कशन संचालित किया गया| इस पैनल डिस्कशन में चर्चा का प्रमुख विषय रहा कि महिलाओं के प्रति हो रहे अत्याचारों से बचाव के लिए क्या किया जाए| पैनल की लगभग सभी वक्ताओं ने यह माना कि महिलाओं के प्रति होने वाली यौन हिंसा सामाजिक गिरावट का प्रतीक है जिसके लिए छात्र-शिक्षकों के माध्यम से सतत अभियान चलाने की जरुरत है| पैनल के एकमात्र पुरुष प्रतिभागी और सीबीएसई कोऑर्डिनेटर बलविंदर सिंह ने इसके लिए हिन्दू समाज की साहित्यिक और सांस्कृतिक विकृतियों को दोषी ठहराते हुए कहा कि जहाँ धर्म ग्रंथों में “ढोल गंवार शुद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी” जैसा फरमान मौजूद हो वहां पर महिलाओं के लिए संवेदना की उम्मीद कैसे की जा सकती है| सभा के उपरांत श्री सिंह के इस वक्तव्य के विरोध में तमाम प्रतिक्रियाएं भी सुनी गयीं| एक प्रतिक्रिया देते वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता शिवेन्दु मिश्र ने तुलसी के रामचरित मानस की एक चौपाई को उदधृत करके बताया कि तुलसी ने महिलाओं अत्याचारी के लिए वध का दण्ड स्पष्ट रूप लिखा है, लेकिन अमूमन लोगों को रामचरित मानस में से अपने मतलब भर की आलोचना ही रुचिकर लगती है| 
अनुज वधू भगिनी सुत नारी सुन सठ ये कन्या सम चारी
इन्हें कुदृष्टि बिलोके जोई, ताहि बधे कछु पाप न होई| तुलसी तो कहते हैं कि  हे मूर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी नीयत से देखता है, उसका वध करने में कुछ भी पाप नहीं होता होता|
कार्यक्रम में आये लोगों ने महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों की मुहीम को समर्पित गौरव बाजपेई को अपना समर्थन और शुभकामनायें प्रेषित कीं| कार्यक्रम के अंतिम चरण में प्रख्यात साहित्यकार और दैनिक जागरण के शीर्षस्थ पत्रकार सुरश अवस्थी ने उपस्थित श्रोताओं को अपनी कविताओं से झकझोरा|  
कानपुर नगर के सीबीएसई कोऑर्डिनेटर बलविंदर सिंह, के के पब्लिक स्कूल की प्रधानाचार्या पूजा सहगल, डीसी लॉ कॉलेज की पूर्व प्रधानाचार्या, डॉ. नंदिनी उपाध्याय, गुरु नानक गर्ल्स इंटर कॉलेज प्रीति कौर, मेडिकल कालेज की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. मीरा अग्निहोत्री, के के गर्ल्स इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्या पूनम सिंह, सरस्वती गर्ल्स डिग्री कॉलेज  नीरू निगम सिकोरिया , एस.एन.सेन गर्ल्स इंटर कॉलेज की श्रीमती पुष्पा त्रिपाठी, अर्मापुर पीजी कॉलेज की प्रधानाचार्या श्रीमती गायत्री सिंह, कानपुर विद्या मंदिर की प्राचार्या डॉ विनीता पांडेय, मेडिकल कॉलेज की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ आरती लाल चंदानी, जवाला देवी गर्ल्स इंटर कॉलेज की प्राचार्या श्रीमती रश्मि अस्थाना, डीसी लॉ कॉलेज के सहायक प्रोफेसर राजीव शुक्ला समेत तमाम प्रोफेसर,शिक्षिकाएंछात्राएंउपस्थित रहे।कार्यक्रम में राहुलअजय विश्वकर्माअंशमंजरीशोभित का विशेष योगदान रहा| इस जुटान में स्वल्पाहार का प्रबंध शहर के प्रमुख कंप्यूटर व्यवसायी संदीप जैन ने किया| आयोजकों द्वारा उनको कोटिशः धन्यवाद ज्ञापित किया गया|

‘प्रताप’ की धरोहर को राष्ट्रीय स्मारक करार दे सरकार

कानपुर। राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर कानपुर प्रेस क्लब में राष्ट्रीय पत्रकारिता पर एक कार्यशाला आयोजित की गयी। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अधिवक्ता और वरिष्ठ पत्रकार कैलाशनाथ त्रिपाठी ने कहा कि आज पत्रकारिता में असहमति की हत्या हो रही है। ये केरल में दक्षिणपंथी पत्रकार और कर्णाटक में वामपंथी पत्रकार की हत्याओं से साफ़ जाहिर है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज की पत्रकारिता में असहमति के लिए जगह कम पड़ रही है, यह विचारणीय पक्ष है जहाँ पर हम में से हर एक पत्रकार को गौर करने की जरुरत है। गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रताप की पत्रकारिता असहमति की पत्रकारिता है।
प्रताप शताब्दी समारोह के समन्वयक सुधांशु त्रिपाठी ने आयोजन श्रंखला में अब तक किये गए कार्यों का संक्षिप्त प्रगति का ब्यौरा प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि प्रताप शताब्दी समारोह की श्रंखला हमने 9 नवम्बर 2012 को शुरू की गई। इस परंपरा के तहत हमने गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रताप अख़बार के माध्यम से पत्रकारिता मूल्यों पर गहन चिंतन मनन शुरू किया। इसी श्रंखला में प्रताप अख़बार की जन्म शताब्दी के दिन शुरू हुई यह परंपरा के पांचवे वर्ष तक पहुंची है, इसी कड़ी में हमने विद्यालयों के छात्रों के बीच जाकर संवाद के लिए विद्यालयों में कार्यशालाएं आयोजित की गयीं। इसी श्रंखला में प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में शहीद पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की तस्वीर भी स्थापित की गई। इस आयोजन का पूरा श्रेय कानपुर प्रेस क्लब, शहर के युवा पत्रकारों और कार्यकारिणी को जाता है।  इसी के अंतर्गत गणेश शंकर विद्यार्थी पर एक शोध ग्रन्थ प्रस्तुत किया गया जिसमे गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रताप के माध्यम से आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाली पत्रकारिता का अनुपम चित्र प्रस्तुत है। कार्यक्रम में अतहर नईम ने पत्रकारों की हत्या पर निराशा व्यक्त की। वरिष्ठ समाजसेवी ने पत्रकारों से इन विषम परिस्थितियों में अवाम की दशा और दिशा देने का आह्वान किया। 
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पूर्व अध्यापक और गाँधीवादी जगदम्बा भाई ने भारतीय पत्रकारिता के वर्तमान सन्दर्भों में निर्भयता और निष्पक्षता को प्रमुखता से जरुरी बताया। निर्भयता और निष्पक्षता वह सामाजिक सम्पदा है जिससे पत्रकारिता मुखर होती है, सार्वजानिक होती है। आज की व्यावहारिक पत्रकारिता में हमारे पत्रकारों को साहसिक और गंभीर होकर मनन करने की जरुरत है। जब गाँधी ने चंपारण सत्याग्रह किया तो कोई पत्रकार उनको छापने को तैयार न था, लेकिन गणेश शंकर विद्यार्थी ने वह साहस दिखाया। सरकार के खिलाफ गाँधी के सत्याग्रह को छापने का काम बड़े साहस का काम था। गिरफ़्तारी हुई, जेल गए, जब्ती हुई। लेकिन उन्होंने सत्य और साहस का साथ न छोड़ा।उन्होंने बताया कि देश की आज़ादी के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र के ब्राह्मण और हजारी प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती पत्रिका और गणेश शंकर विद्यार्थी के अख़बार प्रताप ने समाज में निर्भयता और निष्पक्षता पैदा की। लेकिन आज पत्रकारों के बीच उस भावना का आभाव बढ़ रहा है। पत्रकारों में आध्यात्मिकता का अभाव है, जिसके चलते पत्रकरिता भ्रामक और खतरनाक हालत बना रही है। उन्होंने प्रलोभन से बच कर निर्भय निर्भय निष्पक्षता का उद्घोष करके करके पत्रकारों को देश के लिए आगे बढ़ने का आह्वान किया।  कार्यक्रम के अध्यक्षता पद्म श्री गिरिराज किशोर ने मुखर पत्रकार चंचल कुमार की गिरफ़्तारी का जिक्र करते हुए अपनी निराशा व्यक्त की। उन्होंने बताया कि आज कई सन्दर्भों में पत्रकारों के सामने चुनौतियाँ हैं, हमारे अख़बारों में कॉर्पोरेट की दखल बढ़ रही है। इसलिए अपने लिखे का रिकॉर्ड रखने की जरुरत है, ताकि आने वाले समय में कानून से दमन शोषण न हो सके। आज अख़बार कहते हैं कि हमे राजनीतिक लेख नहीं चाहिए। अपने बारे में लिखिए। साहित्यकारों की समालोचना का भी ख़त्म हो रही है। उन्होंने बताया कि सरकार पत्रकारिता पर बेहिसाब खर्च भी कर रही है। सरकार ने ग्यारह लाख करोड़ मीडिया को दिया है। इन्ही प्रलोभनों में देश की पत्रकारिता का चरित्र डगमगा रहा है, पत्रकारों और पत्रकारिता की दुर्गति सामने है। हिंदुस्तान अख़बार बिक गया क्योंकि उसमे पत्रकारिता धराशायी हो गई। ओम थानवी के समय तक जनसत्ता सरकारी समालोचना में मुखर रहा लेकिन उसके बाद उसके भी तेवर बदले हैं। आज़ादी की लड़ाई का समय पत्रकारों के इसी संघर्ष का गवाह रहा। उस दौर की पत्रकारिता ने पत्रकारों के लिए और अख़बारों के लिए सम्मान अर्जित किया। तब अंग्रेज अधिकारीयों और ब्रिटिश सांसदों तक को इन्तेजार रहता था कि कानपुर के अख़बारों में आज क्या लिखा गया। लेकिन जब आज कोई विदेशी कभी पूछता है कि उनकी प्रेस कहाँ गयी तो समझ नहीं आता कि क्या जवाब दिया जाए।
आज की पत्रकारिता अपनी बदहाली से कैसे उबरे इस विषयक टिपण्णी करते हुए वयोवृद्ध विष्णु चतुर्वेदी ने अपने विचार व्यक्त किया। आकाशवाणी के वरिष्ठ पत्रकार रहे श्री चतुर्वेदी ने बताया कि प्रताप आखबार के मकसद से सबक लेना होगा। इसलिए जरुरी है कि पत्रकारिता को किसी दल के साथ टैग न किया जाए। जे.पी और लोहिया के समय सरकार असहमतियों को लेकर उदार थी, लेकिन हमें इमरजेंसी भी देखने को मिली। यही वजह है कि पत्रकारिता को विरोधी होकर निष्पक्ष रहने की जरुरत है। वयोवृद्ध पत्रकार ने चेताया कि मूल्यों के लिए पत्रकारों को प्रलोभन से मुक्त रहना होगा। उन्हें खुद से सीखना होगा और दुनिया के साथ कदमताल करना होगा।
कार्यक्रम में प्रताप शताब्दी समारोह समिति के सचिव भारतेंदु पुरी ने सरकार के सामने पिछली मांगे दोहराया कि सरकार प्रताप और शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करे। ताकि देश की पत्रकारिता में कानपुर का योगदान सुनिश्चित हो सके। कार्यक्रम का संचालन रामकिशोर बाजपेई ने किया, जिन्हें वरिष्ठ पत्रकार विष्णु चतुर्वेदी ने आचार्य की उपाधि दी। अन्य वक्ताओं में राकेश मिश्र, कुलदीप सक्सेना, सत्य प्रकाश त्रिपाठी समेत तमाम लोग मौजूद रहे जिन्होंने कार्यशाला को संबोधित किया और नवोदित पत्रकारों के विचारों को भी सराहा।
Rakesh Mishra
8896485949
सत्यमेव जयते