Thursday, September 17, 2015

कश्मीर की डिफेन्स और विदेश नीति का जिम्मा हिंदुस्तान और पाकिस्तान साझी विरासत के तौर पर उठायें


दिनांक : 15 सितम्बर 2015
विषय प्रवेषक : रूपचंद
अध्यक्ष : डॉ ओंकार मित्तल

आज के उद्बोधन में जो मेरा विषय वह पिछले अट्ठावन सालों से देश की विदेश नीति में ज्वलंत है| इतने लम्बे अंतराल के बाद भी पाकिस्तान चीन और हिंदुस्तान के मजबूत से मजबूत नेताओं से यह मामला हल ना हो सका| आज पूरी दुनिया एक तंत्र है और उसके दो सौ से ज्यादा आत्म निर्भर उपक्षेत्र हैं| लेकिन जिस तरह से कश्मीर की समस्या बनी उससे न तो यह क्षेत्र आत्म निर्भर बन सका ना ही इसके बाशिंदों को आज़ादी मयस्सर हो सकी|
हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए अंग्रेजी पार्लियामेंट के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट पारित हुआ| सत्ता के हस्तांतरण के लिए हिंदुस्तान के दो हिस्से होंगे ये उसी कानून की शर्त थी| भारत और  पाकिस्तान के डोमिनियन की रियासतों के लिए तीन शर्ते रहीं| पहली ये कि प्रिंसली स्टेट्स के लिए सारे फैसले राजा करेगा| दूसरे कि प्रिंसली स्टेट को आज़ादी होगी कि वह हिंदुस्तान या पाकिस्तान में से जिसके साथ जाना चाहे शामिल हो सकता है| तीसरी शर्त सीमा की साझेदारी की रही| सीमवर्ती क्षेत्रों में रहने वालों के लिए यह शर्त क़यामत की रात लेकर आई|
चौदह अगस्त 1947 को जूनागढ़ रियासत ने अपनी रजामंदी पाकिस्तान के साथ तय की| उसके बाद पाकिस्तान ने हस्तक्षेप किया| राजा हरी सिंह के साथ मुश्किलें बढीं तो हिंदुस्तान की सरकार ने कुछ शर्तें तय करके कश्मीर के राजा का साथ दिया| शर्त रही कि कश्मीर के फोरेन अफेयर्स और करेंसी का जिम्मा हिंदुस्तान का और बाकी मसले कश्मीर की रियाया और राजा के| पाकिस्तान के साथ लड़ाई हुई| नतीजे में आज कश्मीर के दो हिस्से हैं| दो तिहाई हिस्सा भारत में और एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान में| तब से लेकर आज तक चार जंगों के बाद कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र के तीन दफ्तर हैं| उस समय बंटवारे में जो लोग जमीनें छोड़ कर गए जमीनें उन्हीं के नाम पर है|                  
कश्मीर मसले पर गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन ने लिखा कि यह अस्सेसन अस्थाई है, इसका फैसला पब्लिक रेफेरेंडोम करवा के लिया जायेगा| इसी के हल के लिए 1948 में नेहरु और लियाकत अली कश्मीर के मसले को लेकर संयुक्त राष्ट्र पहुंचे| संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के लिए नागरिकों को दिया गया राईट तो प्लेबिसाईट, जिसका मतलब हुआ कि कश्मीरियों को पाकिस्तान या भारत में से किसी एक के साथ रहने की आज़ादी|    
उसके बाद के घटनाक्रमों में ताशकंद में शास्त्रीजी ने कहा कि हमे कश्मीर के लोगों के राष्ट्रवाद पर कोई संदेह नहीं है| यही बात शिमला में इंदिरा गाँधी ने और लाहौर में अटल बिहारी बाजपेई ने दोहराई| आज भी जो कश्मीर को भारत के अटूट हिस्सा मानने की बात करते हैं वे जमीनी हकीक़त को नज़र अंदाज़ ही करते नज़र आते हैं|  सैंतालिस के बंटवारे के समय तीन प्लेयर रहे अंग्रेजी हुकूमत, कांग्रेस और मुस्लिम लीग| तीनों के कारनामों में भारत ने लूज किया| पहला लूज रहा इंडियन फ़ेडरल रिपब्लिक न बन पाना| गाँधी ने प्रार्थना सभा में इसके लिए इंकार कर दिया|  इसमें नेहरु ने कहा कि इस पर आगे संविधान में फैसला किया जायेगा| नेहरु के इस स्टेटमेंट पर जिन्ना ने कहा कि कल फैसला लेना है तो आज ही क्यों नहीं| यह बात बड़ी थी और बंटवारा हो गया|        
कहने को ये बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ लेकिन धर्म के आधार पर जमीनें एक हो सकती हैं क्या| अगर हिंदुस्तान और नेपाल दोनों हिन्दू राष्ट्र हैं तो वो धर्म के आधार पर एक हो सकते हैं क्या|
कश्मीरी राजा कश्मीर की आज़ादी के पक्ष में रहा और कश्मीरी हिंदुस्तान के साथ| ऐसे में जब राजा ने लिख कर दिया कि आप मेरी राय के बिना कश्मीर का अस्सेसन नहीं कर सकते ऐसे में कश्मीरी आवाम के बीच पब्लिक लीडर की गुंजाइश बनी| शेख अब्दुल्ला ने 1952 में एक सुझाव सामने रखा जिसे शेख अकॉर्ड भी कहा जाता है| कश्मीर में जो लोग आर्टिकल 370 की बात करते हैं वो बताएं कि आर्टिकल 370 की आज क्या हैसियत है| रेल, मोबाइल, सीपीडब्लूडी के बाद आर्टिकल 370 का क्या मतलब है?
चार जंगों के बाद कश्मीरी लोगों की हालत बद से बद तर हुए हैं तो इंडियन पीपुल का मन और टोन अप हुआ है| पाकिस्तानी कश्मीर की जो आवाम पहले लिबरल मुसलमान हुआ करती थी एनिमी नोशन के बाद हार्ड लाइनर हुई उसके बाद सुन्नी फंडामेंटल और अब उनके मन पाकिस्तान डोमिनेंस पर हावी है|
इसी तरह हिंदुस्तान के हिस्से वाले कश्मीर की  हिन्दू  आवाम के मन की हिंदुत्ववादी टोनिंग हुई| इसके चलते आज कश्मीर के लिबरल लोगों के सामने पब्लिक रेफेरेंडोम की वास्तविकता को मानने के अलावा कोई और चारा नहीं नज़र आता है| क्योंकि आज का कश्मीरी आवाम मानता है कि कश्मीर में हिंदुस्तान की सरकार की सहमति से ही सी एम् हासिल होता है| इसी नोशन के चलते कश्मीर में आज़ादी के नाम पर एक नया आन्दोलन खड़ा हुआ| उसके खिलाफ हिंदुस्तान की मिलिट्री फोर्सेज का भरी दखल हुआ| इन मामलों में पोलिटिकल पार्टियों का रुख भी खुश खास नहीं रहा| कश्मीर के लिए पोलिटिकल पार्टी वो डेड हॉर्स है जिसे चाहे जितनी चबुकें मार लीजिये पब्लिक के लिए कुछ हासिल नहीं होने वाला| हाल के दिनों  में खास कर हिंदुस्तान के तेलंगाना ही हीट वेव्स, उत्तरखंड की तबाही नेपाल का भूकम्प और कश्मीर में बाढ़ के जो हालात दिखाई पड़े हैं उस पर पोलिटिकल पार्टियाँ कुछ भी कर पाने की हैसियत में नहीं हैं|     इसी तरह धर्म की राजनीति भी पूंजीपतियों के औजार के तौर पर ही कश्मीर के मामले में नासूर बन रहा है|
हाल के दिनों में कश्मीर की आवाम के मन  में तीन ट्रेंड डेवेलोप हुए हैं| एक है मर्जर विथ पाकिस्तान दूसरा फुल इंटीग्रेशन विथ इंडिया तीसरा है इंटरनेशनल बॉर्डर बना कर इंडिपेंडेंस| इंडिपेंडेंस वो स्लोगन है जिस पर सुपर पॉवर को मौका मिलता है| तीसरे खेल में कश्मीर अमेरिका, चीन, रसिया, पाकिस्तान के बीच में बनाना रिपब्लिक बनता नज़र आता है|  कुछ फ़ॉर्मूले और भी दाखिल हुए हैं जिनमें अगर सैंतालिस को  दोबारा रिपीट करना है तो सबब बनेगा डिक्शन प्लान| एक रास्ता है निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा| लेकिन ये सब पुराना माल है अगर दिमाग की वीरानी खोलनी हो तो ये कसरतें करिए|

सार्क की साझी विरासत में तीन बिंदु हैं| अगर हिंदुस्तान और पाकिस्तान साझी विरासत के तौर पर कश्मीर की डिफेन्स और विदेश नीति का जिम्मा उठाने को तैयार ना हों तो कश्मीर को सार्क की साझी विरासत में शामिल किया जाए मतलब कश्मीर सार्क डोमिनियन बने|  कश्मीर की आवाम के लिए प्रो-ह्यूमन, प्रो नेचर डेवलपमेंट के लिए बॉर्डर कमीशन बनाया जाए| इसी तरह क्लाइमेट और ह्यूमन डेवलपमेंट के लिए कमीशन बनाये जाएँ|            
इसी तरह के एक प्रयोग में नार्थ ईस्ट की सीमा समस्या के लिए हल करने की कोशिशें हुईं| असम के साथ के हिस्सों को जोड़कर “सेवेन सिस्टर्स” बनी|  उसी तर्ज पर कश्मीर में एथ्नों-ओरिजिन ग्रुप्स में प्रमुख रूप से डोगरा, पुठवार, किश्तवाड़ समेत नौ समुदायों को मिला कर नाइन ब्रोदेर्स का फार्मूला बनाया जा सकता है|
जब तिब्बत को  चीन ने कब्जे में ले लिया तो तिब्बती आये| विस्थापित तिब्बतियों को धर्मशाला में रखा गया| अब तिब्बत में दो सरकारें हैं चीनी सरकार और विस्थापित सरकार| आज जम्मू कश्मीर में स्टेपल वीजा का जो खेल चल रहा है वो सुपर पॉवर का खेल है| 1971 में मुक्ति वाहिनी कहाँ से आई| लिट्टे पैदा किया तो लिट्टे ने ही भारत के प्रधानमंत्री को खाया| आज भारत की डेमोक्रेसी अंकल सैम के नाम से चलती है| 

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